आध्यात्ममंदसौरमंदसौर जिला
रूद्राक्ष धारण करने वाले को अभक्ष्य भोजन और अमर्यादित कर्मों से बचना चाहिए- पूज्य निग्रहाचार्य भागवतानन्द

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मन्दसौर। पतंजलि योग संगठन जिला प्रभारी योग गुरू बंशीलाल टांक ने बताया कि खानपुरा स्थित रामानुज कोट में सप्तदिवसीय भागवत कथा समापन के पश्चात भगवान श्री पशुपतिनाथ आराधना भवन में पूज्य निग्रहाचार्य भागवतानंदजी गुरूजी के शिव तत्व पर गूढ़ सारगर्भित प्रवचन हुए। आपके साथ तीन छत्री बालाजी महंत श्री रामकिशोरजी महाराज भी मंचासीन रहे।
पूज्य निग्रहाचार्यजी ने कर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि प्रत्येक कर्म सुचिता पूर्वक हमारे शरीर व वर्ण के अनुसार होना चाहिए। आपने कहा कि हम न तो देव है और नहीं दानव है। भगवान ने हमें मानव रूप में धरती पर भेजा है। मानव में स्त्री पुरूष सबके जो कर्म निर्धारित है तद्नुसार ही सबको कर्म करना चाहिये। शासन प्रशासन सरकार में जिस मंत्री अधिकारी के दायित्व में जो विभाग सौंपा जाता है उसे उसी विभाग का कार्य निष्ठापूर्वक इमानदारी से सम्पादित करना होता है। उसी प्रकार हमें भी शास्त्राज्ञानुसार अपने कार्य करना चाहिए।
रूद्राक्ष शिवजी का ही स्वरूप है- रूद्राक्ष किसी पेड़ का साधारण फल नहीं बल्कि साक्षात शिवजी का ही स्वरूप है। रूद्राक्ष धारण करने वाले को कभी भी अमर्यादित कर्म और अभक्ष्य भोजन नहीं करना चाहिये। अभक्ष्य भोजन मांस मदिरा आदि ग्रहण करने वाले से शिवाजी कोसो दूर रहते है। भांग का गोला भी शिवजी ग्रहण नहीं करते।
शास्त्रों के मर्म को समझकर कर्म करने- शास्त्रों के अनुसार हम तभी चल सकते है जब हम शास्त्रों के मर्म को भली भांति समझ कर खुद शास्त्र बन जाये और हम शास्त्र भी तभी बन सकते है जब किसी शास्त्रज्ञ विद्वान शास्त्र वेत्ता से शास्त्राध्ययन करे।
श्रद्धालु जिज्ञासु भक्त ही ज्ञान पाने का अधिकारी होता है- महादेव अपना ज्ञान अपनी भक्ति का वरदान उसी को देते है जिसका हृदय निष्कपट, निश्छल और निर्मल होता है।
जिस शरीर में हम रहते है उसकी आंतरिक क्रिया-नस नाड़ियों के संचालन आदि हम नहीं जान सकते तो फिर अदृष्य देवताओं की महिमा उनके क्रिया कलाप के संबंध में कैसे जान सकते है।
जीवन की प्रत्येक क्रिया शुद्ध होना चाहिए- शिव तत्व अशुद्ध नहीं परम पवित्र है इसलिये शिवजी की पूजा आराधना भी शुद्ध होना चाहिये। केवल पूजा पाठ ही नहीं जीवन की प्रत्येक क्रिया-कर्म शुद्ध और पवित्र होना चाहिये तभी आशुतोष भगवान शिवजी को आशीर्वाद मिलता है। हमारा भाव कुभाव नहीं सद्भाव होना चाहिये। ललाट पर त्रिपुण्ड (तिलक) प्रदर्शन के लिये नहीं दर्शन के लिये लगाना चाहिये।
शिवलिंग (शिवजी) को पत्थर समझकर उस पर जमी काई (कांजी) को ब्रश-साबुन से रगड़कर नहीं बल्कि आंवला अथवा निम्बू आदि फलों के रस से स्वच्छ वस्त्र से हटाना चाहिये।
मानसिक भजन सुमिरन सर्वोपरी है- भगवान का भजन सुमिरन वाणी से करने पर मन अन्यत्र भटक सकता है। इसलिये शरीर-वाणी के स्थान पर मानसिक भजन पूजन सुमिरन श्रेष्ठ है।
प्रदक्षिणा-परिक्रमा का भाव परमात्मा को सर्वत्र देखना है।
अज्ञानतावश किया गया पापकर्म क्षम्य है- एक बार अज्ञानतावश नासमझी के कारण किया गया पापकर्म तो क्षम्य है परन्तु ज्ञान होने के बाद भी फिर बार-बार किये जाने वाला पापकर्म में क्षमा का नहीं दण्ड का विधान है।
प्रवचन में सम्मिलित हुए- स्वामी श्री दशरथानंद सरस्वती, पंडित सुदर्शन आचार्य, पुरुषोत्तमानंद गुरु, दीपेश आचार्य, योग गुरू बंशीलाल टांक, विशाल शर्मा, सचिन शर्मा, ब्रजेश पांडे, अनुपम त्रिवेदी, प्रद्युमन शर्मा, पशुपतिनाथ संस्कृत पाठशाला के समस्त ब्राह्मण विद्यार्थी बटुक सहित कई श्रोताओं ने प्रवचन का लाभ लिया।
पूज्य निग्रहाचार्यजी ने कर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि प्रत्येक कर्म सुचिता पूर्वक हमारे शरीर व वर्ण के अनुसार होना चाहिए। आपने कहा कि हम न तो देव है और नहीं दानव है। भगवान ने हमें मानव रूप में धरती पर भेजा है। मानव में स्त्री पुरूष सबके जो कर्म निर्धारित है तद्नुसार ही सबको कर्म करना चाहिये। शासन प्रशासन सरकार में जिस मंत्री अधिकारी के दायित्व में जो विभाग सौंपा जाता है उसे उसी विभाग का कार्य निष्ठापूर्वक इमानदारी से सम्पादित करना होता है। उसी प्रकार हमें भी शास्त्राज्ञानुसार अपने कार्य करना चाहिए।
रूद्राक्ष शिवजी का ही स्वरूप है- रूद्राक्ष किसी पेड़ का साधारण फल नहीं बल्कि साक्षात शिवजी का ही स्वरूप है। रूद्राक्ष धारण करने वाले को कभी भी अमर्यादित कर्म और अभक्ष्य भोजन नहीं करना चाहिये। अभक्ष्य भोजन मांस मदिरा आदि ग्रहण करने वाले से शिवाजी कोसो दूर रहते है। भांग का गोला भी शिवजी ग्रहण नहीं करते।
शास्त्रों के मर्म को समझकर कर्म करने- शास्त्रों के अनुसार हम तभी चल सकते है जब हम शास्त्रों के मर्म को भली भांति समझ कर खुद शास्त्र बन जाये और हम शास्त्र भी तभी बन सकते है जब किसी शास्त्रज्ञ विद्वान शास्त्र वेत्ता से शास्त्राध्ययन करे।
श्रद्धालु जिज्ञासु भक्त ही ज्ञान पाने का अधिकारी होता है- महादेव अपना ज्ञान अपनी भक्ति का वरदान उसी को देते है जिसका हृदय निष्कपट, निश्छल और निर्मल होता है।
जिस शरीर में हम रहते है उसकी आंतरिक क्रिया-नस नाड़ियों के संचालन आदि हम नहीं जान सकते तो फिर अदृष्य देवताओं की महिमा उनके क्रिया कलाप के संबंध में कैसे जान सकते है।
जीवन की प्रत्येक क्रिया शुद्ध होना चाहिए- शिव तत्व अशुद्ध नहीं परम पवित्र है इसलिये शिवजी की पूजा आराधना भी शुद्ध होना चाहिये। केवल पूजा पाठ ही नहीं जीवन की प्रत्येक क्रिया-कर्म शुद्ध और पवित्र होना चाहिये तभी आशुतोष भगवान शिवजी को आशीर्वाद मिलता है। हमारा भाव कुभाव नहीं सद्भाव होना चाहिये। ललाट पर त्रिपुण्ड (तिलक) प्रदर्शन के लिये नहीं दर्शन के लिये लगाना चाहिये।
शिवलिंग (शिवजी) को पत्थर समझकर उस पर जमी काई (कांजी) को ब्रश-साबुन से रगड़कर नहीं बल्कि आंवला अथवा निम्बू आदि फलों के रस से स्वच्छ वस्त्र से हटाना चाहिये।
मानसिक भजन सुमिरन सर्वोपरी है- भगवान का भजन सुमिरन वाणी से करने पर मन अन्यत्र भटक सकता है। इसलिये शरीर-वाणी के स्थान पर मानसिक भजन पूजन सुमिरन श्रेष्ठ है।
प्रदक्षिणा-परिक्रमा का भाव परमात्मा को सर्वत्र देखना है।
अज्ञानतावश किया गया पापकर्म क्षम्य है- एक बार अज्ञानतावश नासमझी के कारण किया गया पापकर्म तो क्षम्य है परन्तु ज्ञान होने के बाद भी फिर बार-बार किये जाने वाला पापकर्म में क्षमा का नहीं दण्ड का विधान है।
प्रवचन में सम्मिलित हुए- स्वामी श्री दशरथानंद सरस्वती, पंडित सुदर्शन आचार्य, पुरुषोत्तमानंद गुरु, दीपेश आचार्य, योग गुरू बंशीलाल टांक, विशाल शर्मा, सचिन शर्मा, ब्रजेश पांडे, अनुपम त्रिवेदी, प्रद्युमन शर्मा, पशुपतिनाथ संस्कृत पाठशाला के समस्त ब्राह्मण विद्यार्थी बटुक सहित कई श्रोताओं ने प्रवचन का लाभ लिया।