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मधुशाला: बच्चन जी का काव्य आज भी युवाओं के बीच उतनी ही लोकप्रिय होकर जीवन का पाठ है 

मधुशाला: बच्चन जी का काव्य आज भी युवाओं के बीच उतनी ही लोकप्रिय होकर जीवन का पाठ है 

साहित्य जगत में हरिवंश राय बच्चन एक ऐसा नाम है, जिन्होंने कविता को महलों से निकालकर आम आदमी की संवेदनाओं तक पहुँचाया। इलाहाबाद (प्रयागराज) की मिट्टी में जन्मे बच्चन जी ने ‘हालावाद’ का प्रवर्तन किया। उनकी लेखनी में वह साहस था जो जीवन की कड़वी सच्चाई को भी बेहद मधुर लय में गा सकता था। ‘मधुशाला’ उनकी वह कालजयी कृति है, जो 1935 में पहली बार प्रकाशित हुई और आज भी युवाओं के बीच उतनी ही लोकप्रिय है। बच्चन जी ने ‘शराब’, ‘प्याला’ और ‘साकी’ जैसे शब्दों को महज नशे के प्रतीक नहीं, बल्कि जीवन की दार्शनिकता के औजार के रूप में इस्तेमाल किया।

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जब इंसान तनाव और अकेलेपन से जूझ रहा है, तब बच्चन जी की ‘मधुशाला’ हमें ठहरकर सोचने का मौका देती है। ‘मधुशाला’ का अर्थ शराबखाना नहीं, बल्कि यह ‘संसार’ है, जहाँ हम सब अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे हैं। ‘मधुशाला’ व्यक्ति को खुद के भीतर झांकने का साहस देती है। एक व्यक्ति के जीवन में उतार-चढ़ाव, सफलता-असफलता और आशा-निराशा का चक्र चलता रहता है।

बच्चन जी कहते हैं कि जीवन के प्याले में जो भी ‘मदिरा’ (परिस्थितियाँ) मिले, उसे प्रसन्नता से पीना चाहिए। व्यक्ति जब अपनी कमियों और दुखों को स्वीकार कर लेता है, तो वह मानसिक रूप से स्वतंत्र हो जाता है।

व्यक्ति अपनी यात्रा में अकेला है, लेकिन वह अकेलापन बोझ नहीं बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। मधुशाला सिखाती है कि बाहर की भीड़ से ज्यादा जरूरी अपने भीतर की शांति को पाना है।

वर्तमान समय में, जहाँ समाज धर्म, जाति और विचारधाराओं के नाम पर बंटा हुआ है, ‘मधुशाला’ एक क्रांतिकारी संदेश देती है।

बच्चन जी की प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं—

“मसलक-मजहब मेल कराती मधुशाला” यह पंक्ति आज के समाज के लिए एक मंत्र की तरह है। वे बताते हैं कि मंदिर और मस्जिद आपस में लड़वाते हैं, लेकिन जब इंसानियत के नाते लोग एक साथ बैठते हैं, तो सारे भेदभाव मिट जाते हैं। यह उस ‘बंधुता’ (Fraternity) का दर्शन है, जिसकी कल्पना हमारे संविधान ने की है।

मधुशाला का द्वार सबके लिए समान रूप से खुला है। वहाँ न कोई राजा है, न रंक। यह एक ऐसे समावेशी समाज का प्रतीक है जहाँ व्यक्ति की पहचान उसके ओहदे से नहीं, बल्कि उसकी प्यास (जिज्ञासा और प्रेम) से होती है।

आज के युवा जो अक्सर करियर और जीवन की उधेड़बुन में भटक जाते हैं, उनके लिए ‘मधुशाला’ का दर्शन एक ‘कंपास’ की तरह काम करता है।

दुनिया में हजारों रास्ते और राय देने वाले लोग मिलेंगे, लेकिन बच्चन जी का मंत्र स्पष्ट है— “राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।” यह युवाओं को सिखाता है कि भटकाव को त्यागकर अपनी चुनी हुई राह पर ईमानदारी से चलना ही सफलता की एकमात्र कुंजी है।

यह रचना सिखाती है कि समय सीमित है, इसलिए नफरत में वक्त बर्बाद करने के बजाय सृजन और प्रेम में जीवन जीना चाहिए।

अंततः, ‘मधुशाला’ कोई काव्य पुस्तक नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभव है। यह व्यक्ति को उसके दुखों से लड़ना सिखाती है और समाज को घृणा से ऊपर उठकर प्रेम करना सिखाती है। बच्चन जी ने जिस ‘मधुशाला’ की नींव रखी थी, वह असल में एक ऐसे ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की नींव थी जहाँ हर इंसान दूसरे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर जीवन के अमृत का आनंद ले सके।

लेखक के बारे में

राकेश यादव एक घुमंतू राहगीर कहानीकार हैं—जो रास्तों से सीखते हैं, लोगों से सुनते हैं और लोक की धड़कनों में अपना लेखन खोजते हैं। मध्यप्रदेश के नर्मदापुरम ज़िले के ग्राम डेठी गंजाल, सिवनी मालवा से निकलकर वे आज इंदौर में रहकर कबीर जन विकास समूह के साथ युवाओं, कलाकारों और समुदायों के बीच संवाद, दस्तावेज़ीकरण और रचनात्मक हस्तक्षेप का काम कर रहे हैं। लोककला, संतवाणी और मानवीय मूल्यों पर उनका काम शोध, लेखन और कला-संवाद के माध्यम से आगे बढ़ता है।

पिछले 17 वर्षों से सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय राकेश ने 2000 से अधिक लेख, 4000 कविताएँ और 700 से अधिक युवा कहानियाँ लिखी हैं—उनका लेखन समाज की अनकही आवाज़ों को सामने लाने और खुद को समझने का ईमानदार प्रयास है। Juganoo पत्रिका, जैसे मंच, उनकी उस दृष्टि का विस्तार हैं जहाँ कबीर, निर्गुण परंपरा और संविधान एक-दूसरे से संवाद करते हैं।

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