
सिर्फ पूछताछ के लिए गिरफ्तारी नहीं, पुलिस की मनमानी पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा प्रहार
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि पुलिस किसी भी व्यक्ति को सिर्फ सामान्य पूछताछ के लिए गिरफ्तार नहीं कर सकती। जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और एन.के. सिंह की पीठ ने कहा कि गिरफ्तारी तभी की जानी चाहिए जब जांच के लिए यह अत्यंत आवश्यक हो, न कि केवल सुविधा के लिए। यह पुलिस की मनमानी और बिना ठोस कारण के होने वाली गिरफ्तारियों पर एक कड़ा प्रहार है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पुलिस की गिरफ्तारी की शक्तियों पर कड़ा रुख अपनाते हुए कई महत्वपूर्ण दिशानिर्देश जारी किए हैं, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए एक बड़ा कदम माने जा रहे हैं।
▪️7 साल से कम सजा वाले मामलों में नोटिस अनिवार्य: फरवरी 2026 के एक ऐतिहासिक फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 35(3) के तहत उन अपराधों के लिए नोटिस देना अनिवार्य है जिनमें सजा 7 साल तक की है। पुलिस ऐसे मामलों में सीधे पूछताछ के लिए गिरफ्तार नहीं कर सकती।
▪️जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि गिरफ्तारी केवल तभी की जानी चाहिए जब वह ‘अत्यंत आवश्यक’ हो। पुलिस की शक्ति केवल एक ‘विवेकाधीन’ शक्ति है, कोई अनिवार्य आदेश नहीं।
▪️कोर्ट ने धारा 35(6) BNSS का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति को पहले नोटिस (Section 35(3)) दिया गया है, तो उसे बाद में गिरफ्तार करने के लिए पुलिस के पास ‘नया मटीरियल’ या नए सबूत होने चाहिए। पुराने आधारों पर गिरफ्तारी नहीं की जा सकती।
▪️कोर्ट ने साफ किया कि पुलिस किसी व्यक्ति को “सिर्फ सवाल पूछने” के लिए गिरफ्तार नहीं कर सकती। जांच के लिए हिरासत तभी ली जानी चाहिए जब वह बेहद अनिवार्य हो।
▪️गिरफ्तार व्यक्ति को लिखित में गिरफ्तारी के कारण बताना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है। यदि ये कारण आरोपी की समझ में आने वाली भाषा में नहीं दिए जाते, तो गिरफ्तारी और रिमांड दोनों को “अवैध” माना जाएगा।
▪️लिखित आधार मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने से कम से कम दो घंटे पहले आरोपी को मिल जाने चाहिए।
▪️व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि: सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस को याद दिलाए संविधान के अनुच्छेद 21 और 22″
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