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विकास की दौड़ में पिसता भारत – इंसानियत घटी, नफरत बढ़ी

विकास की दौड़ में पिसता भारत – इंसानियत घटी, नफरत बढ़ी
आलेख- विमल चंद्र जैन “मच्छी रक्षक”
आलेख- विमल चंद्र जैन “मच्छी रक्षक”
हमारा देश कभी सोने की चिड़िया कहा जाता था, जहां दूध, घी की नदियां बहा करती थी विश्व गुरु कहां जाता था ? वहां आज 81 करोड़ से ज्यादा लोग प्रति माह 5 किलोग्राम मुक्त सरकारी अनाज पर आश्रित होने के बाद भी भारत विकास के शोर में डूबा हुआ है– जीडीपी बढ़ रही है “विश्व गुरु बन रहे हैं या दिखावा कर रहे हैं” विकास की दौड़ में तेजी से भागता यह देश जहां — इमारतें ऊंची उठ रही है, धरती से अंतरिक्ष तक की ऊंचाई पर पहुंच चुके हैं, गरीब है भी और ऊपर भी उठ रहे हैं, सड़के चौड़ी और लम्बी हो रही है, उन पर दौड़ने वाली गाड़ियां भी लग्जरी हो रही है, कृषि क्षेत्र में विस्तार हो रहा है, पर क्या यही सब विकास है ? विकसित भारत कह लाने के लिए पर्याप्त है ? नहीं , हमें आज उन अंधेरों से उबरने की आवश्यकता है जो हमें विकास की सही राह पर चलने से भटकाते हैं — जाति भेदभाव नाम पर सामाजिक अन्याय के उदाहरण आए दिन मिल रहे हैं, इंसानियत घट रही है, मानवीय मूल्यों का हास हो रहा है। राजनेताओं और बड़े-बड़े तथाकथित साधु संतों द्वारा धर्म, संप्रदाय नाम पर समाज को बांटने के षड्यंत्र आए दिन रचे जा रहे हैं। ऐसे समय में विकास के आंकड़े चमकाए जा रहे और भाषणों में विकसित भारत का सपना बार-बार गूंजता रहता है। असल में यह विकास कुछ हाथों में सिमटता हुआ दिखाई दे रहा है, और बात देश विकास की करते हैं सिर्फ विकास का मुखौटा पहने हुए है ? क्योंकि अधिकांश भारतीयों की जेबें आज भी खाली है, यही इस युग में देश की सबसे बड़ी विडंबना है। विकास की चकाचौंध असल में गरीबी का नया मेकअप है। अमीर और अमीर हो रहा है गरीब अपनी रोटी गिन रहा है अधूरी थली और उधर की जिंदगी जी रहा क्या करें मजबूर हैं। यह कैसा विकास, कैसी विडंबना हम “५ ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी की बात करते हैं, जीडीपी आंकड़ों का खेल सिर्फ वाह-वाही तक ही सीमित है, धरातल की सच्चाई कुछ और बयां करती है — विकास तो नेताओं का हो रहा है, अमीरों का हो रहा है इनका रहन-सहन खान-पान सब विकास की दौड़ से आगे है। बेचारी जनता तो धोखा, छल, कपट और सांप्रदायिक नफरत के चक्रव्यूह में उलझती जा रही है। शिक्षा और स्वास्थ्य व्यापार बन चुके हैं। बच्चों की शिक्षा इतनी महंगी की एक सपना बनकर रह गई है। किसान परेशान आत्महत्या कर रहा है। नौजवानों के पास डिग्री पर रोजगार उपलब्ध नहीं ऐसी स्थिति में विकास कैसे कहा जा सकता है यह तो विकास नाम के दिखावे में, देश चमकता जरूर पर जनता परेशान हैं, मायूस है, चेहरे की मुस्कान गायब है। नीतियां जनता की भलाई से हटकर अमीरों के मुनाफे पर टिकी हुई हो तो ऐसे में राष्ट्र विकास नहीं करता वह बिकता है– नीतियां बिक चुकी है। प्रति व्यक्ति आय में भी हम दुनिया के पहले सवा सौ देशों में भी नहीं आते हमारा सारा अर्थतंत्र पूंजी कुछ अमीरों की मुट्ठी में कैद है और ८९ फ़ीसदी से भी ज्यादा भारतीय निम्न आय पर या किसी तरह गुजारा कर रहे हैं। विकास नाम से एक भ्रम उत्पन्न किया जा रहा है। इन सवालों के जवाब आसान नहीं है; क्योंकि हमारी इच्छा शक्ति कमजोर है हम सोचते कम और मान जल्दी लेते हैं — अंध भक्ति का प्रभाव ज्यादा, मस्तिष्क गिरवी रखा हुआ है, राजनीति आज सेवा नहीं, सत्ता का व्यापार बन गई है ?; देश में सांप्रदायिकता का जहर फैलता जा रहा है। हमारा सामाजिक ताना-बाना पूरी तरह क्षतिग्रस्त होने की कगार पर खड़ा है। विकास का रास्ता असमानता–विषमता के रास्ते से भरा पड़ा ऐसे में यह भारत विकसित कैसे बनेगा ? जनता सचमुच की खुशी और खुशहाली से लगातार वंचित होती जा रही है। राजनीति पर गौर करें तो उसका धर्म और मजहब सांप्रदायिक खिंचाव हमारे अपने विकास के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। वह अहंकार के चलते अपने कर्तव्य पथ से भटक चुकी है। जनता के समूचे जीवन की वाणी को बेसुरा बनाए हुए हैं। विकास की ढाल अब ढाल नहीं रही वह सिर्फ सत्ता का दिखावी मुखौटा बनकर रह गई है। दरअसल विकसित भारत तभी होगा जब जनता खुशहाल हो, टैक्स के मन माने भार से मुक्त हो, नफरत नहीं सौहार्दपूर्ण वातावरण हो तभी विकास की ओर बढ़ते कदम मजबूत होंगे व भारत विकासशील देश बनेगा।



