आध्यात्ममंदसौरमध्यप्रदेश

गौमाता का गोमूत्र व गोबर आज भी उत्तम – पंडित रूद्रदेव त्रिपाठी

पशुपतिनाथ मंदिर परिसर में भागवत विचार संस्थान द्वारा आयोजित द्वितीय दिवस की शिव महापुराण कथा का समापन
मंदसौर। अष्टमुखी श्री पशुपतिनाथ महादेव मंदिर,मंदसौर भव्य प्रतिष्ठा पाटोत्सव 65 वां वर्ष पर 11 दिवसीय आयोजन में गुरुवार को व्यासपीठ पर राष्ट्रीय कथा व्यास पं. रुद्रदेव  त्रिपाठी जावद वाले के मुखारविंद से द्वितीय दिवस की श्री शिव महापुराण कथा प्रारम्भ हुई।कथा के प्रारम्भ में पत्रकार सोनू गुप्ता ने पंडित रूद्रदेव त्रिपाठी का स्वागत व सम्मान किया।

भागवत विचार संस्थान के पंडित श्री कृष्ण वल्लभ शास्त्री द्वारा आयोजित इस कथा में पं रूद्रदेव त्रिपाठी जावद वाले ने शिव महापुराण कथा वर्णन करते हुए सर्वप्रथम ‘‘भोलेनाथ डमरू वाले‘‘ मंत्र का जाप के बाद कहा कि शिव महापुराण में सात संविदा होती है।प्राचीन समय में 1 लाख श्लोक होते थे. और 12 संविदा में विनायक, कुमार, मातृ, एकादशमी, विलास, शब्दसूत्री, कोटिरूद्र,सहस्त्रकोटि,धर्म संविदाये होती थी। लेकिन वर्तमान में सात संविदाओ में से प्रथम संविदा में वित्तेश्वर संविदा अनुसार कहा कि प्रयागराज में तीन महानदियों का संगम है। प्रयाग वही होता है जहाँ तीन धाराओं का समावेश होता है। धर्म भी वही होता है जहाँ प्रयाग है।

पंडित रूद्रदेव त्रिपाठी ने आगे कहा कि भगवान शिव के दो रूप में प्रथम लिंग स्वरूप व द्वीतीय आकार स्वरूप है। कथाअनुसार ब्रह्म नारायण से बोले  कि तुम्हारे पिता आये मुझे प्रणाम करो, नारायण बोले आप मेरे पिता नही हो आप मेरी नाभि से प्रकट हुए हो अतः आप मुझे प्रणाम करो। भगवान नारायण और ब्रह्म जी में मैं बड़ा को लेकर विवाद हो गया। दोनों के विवाद में भगवान शिव अग्रीय स्तम्भ में प्रकट हुए। तब उनको देखकर भगवान नारायण ने कहा कि मैं नीचे आधार की गहराई पता लगाता हूं आप ऊपर मस्तीष्क का पता लगाए जो पहले खोजकर आएगा वो बड़ा!भगवान नारायण को मस्तीष्क का अंत भाग कहाँ है यह पता नही चला और हार मान गए। लेकिन उधर भगवान ब्रह्म जी ने ऊपर जाकर मस्तिष्क के केतक पुष्प को कहा कि नारायण को कह देना कि मैंने मस्तिष्क के अंत भाग का पता लगा लिया। और लालसा देकर गवाही के रूप में मना लिया। केतक पुष्प ब्रह्म जी की बातो में आ गया। दूसरी गवाही  के रूप में गौ माता को ब्रह्मा जी ने कहा नारायण से कह देना कि मैंने मस्तिष्क के अंत का पता लगा लिया फिर गईया तेरे गौमूत्र और गोबर पवित्र बना देंगे कि यज्ञ व हवन में उपयोग में आएगा। अब जब ब्रह्म जी और नारायण जी मिलते है तब भगवान ब्रह्म जी कहते है, कि है नारायण तू आधार व गहराई का पता नही लगा पाया। और मैंने मस्तिष्क के अंत भाग का पता लगा लिया। और अनुमान से फिट व ऊचाई बता दी। और कहा अब मैं बड़ा कहलाऊंगा। मेरे दो गवाह भी इस बात की गवाही दे रहे गौमाता व केतक पुष्प ने सिर हिला दिए।भगवान शिव के समक्ष इस असत्य को जीतते हुए देखकर स्वयं ही साक्षात् डमरू व त्रिशूल लेकर प्रकट हुए। और ब्रह्मा जी को नारायण के समक्ष झूठा बताकर ब्रह्मा जी का 5 वां मुख अपने नाखून से काट दिया। और फिर ब्रह्म जी चार मुख ही रह गए। और ब्रह्म जी को श्राप दिया कि झूठ बोलने के कारण अब जगत व विश्व में तुम्हारी कहीं पूजा नहीं होगी। साथ ही दोनों गवाह गौ माता को श्राप में कहा मुख भ्रष्ट हो जायेगा। इसलिए आज भी गौ माता के गौ मूत्र व गोबर उत्तम मानते है व इसकी पूजा की जाती है।केतक पुष्प को श्राप दिया कि आज के बाद मेरे मस्तक पर केतक पुष्प वर्जित रहेगा। और साथ ही भगवान नारायण को आशीर्वाद दिया कि आप सत्य के साथ रहे अतः आप नाना रूप धारण करने में सक्षम होंगे।और भगवान नारायण ने कई रूप धारण कर लिए। जिस दिन भगवान शिव नारायण और ब्रह्म के समक्ष प्रकट हुए वो दिन महाशिवरात्रि कहलाया।

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