राष्ट्रीय बाल संरक्षण अधिकार आयोग की सुस्ती शिक्षा में बच्चों पर हो रहा अत्याचार – श्री चन्द्रे
National Commission for Protection of Child Rights lethargy education

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मन्दसौर। मध्य प्रदेश सहित पूरे भारत में नर्सरी कक्षा से लेकर कक्षा पांचवी तक स्कूल प्रातः 9 बजे से 2 बजे तक लगते हैं जिसके कारण नर्सरी तथा एलकेजी यूकेजी और अन्य कक्षाओं के बच्चे ठीक से नींद भी नहीं निकाल पाते और उन्हें स्कूल जाने का टेंशन होता है।
सामान्यतः चिकित्सा क्षेत्र में यह मान्यता है कि छोटे बच्चों को पर्याप्त नींद लेना चाहिए तथा प्रातः काल का शौच ठीक प्रकार से होना आवश्यक है अन्यथा बच्चे शारीरिक और मानसिक विकारों से ग्रसित होकर अस्वस्थ हो जाएंगे।
महानगरों में उक्त कक्षा के बच्चे जिन्हें 9 बजे स्कूल पहुंचना होता है उनके माता-पिता उन्हें 6.30 बजे जगा देते हैं उनकी प्रातः विधि नहीं होती और उन्हें नहला धुला कर 8 बजे बस स्टॉप पर खड़ा कर दिया जाता है एक से डेढ़ घंटा वह बसों में घूमते हैं तथा स्कूल पहुंचते हैं इसके बाद 2 बजे छुट्टी होती है फिर उसे एक डेढ़ घंटा बसों में घूमना है और घर पहुंचना है ऐसी स्थिति में वह घर जाकर सो जाता है पर पूरी नींद ही नहीं होती और उसे होमवर्क करने के लिए उठाया जाता है देर रात तक वह होमवर्क करता है आमतौर पर 10 या 11 बजे सोते हैं सुबह फिर 6.30 बजे उठना है यह एक प्रकार का अत्याचार है इसके साथ ही अनेक स्कूलों में बच्चे 20 किलोमीटर से लेकर 60 किलोमीटर की यात्रा बसों में करते हैं खास तौर पर महानगरों में जो बच्चे ग्रामीण क्षेत्र आते हैं ।
उक्त विचार व्यक्त करते हुए शिक्षाविद रमेशचन्द्र चन्द्रे ने कहा कि राष्ट्रीय बाल संरक्षण अधिकार आयोग को इस बात को संज्ञान में लेना चाहिए और संबंधित स्कूलों को एवं प्रदेश एवं केंद्र सरकार के शिक्षा विभाग को यह निर्देश करना चाहिए की नर्सरी कक्षा से लेकर पांचवी तक की कक्षाएं प्रातः 11.30 या 12 बजे से लगाएं यदि स्कूल वैसा नहीं करते हैं तो उनकी मान्यता पर रोक लगाई जा सकती है।
श्री चन्द्रे ने यह भी कहा कि अन्य गतिविधियों में बच्चों की भागीदारी इसलिए नहीं हो पाती कि उनके पास कोई समय नहीं है तथा निजी शिक्षण संस्थाएं अपने व्यवसायिक हितों को ध्यान रखती है इसके कारण बच्चों की पीढ़ियां बर्बाद होने के कगार पर है।
बाल संरक्षण आयोग सर्वे करें तो प्राइवेट स्कूल के अनेक विद्यार्थी पेट रोग से ग्रसित तथा मानसिक विकारों से भरे पूरे हैं।
श्री चन्द्रे ने आग्रह किया है कि इस विषय को गंभीरता से लेना चाहिए तथा नर्सरी से लेकर कक्षा पांचवी तक किताबों के बोझ को भी कम करना चाहिए।