
नीमच 6 अगस्त (केबीसी न्यूज़) परिवार की सुख शांति और समृद्धि का प्रमुख आधार प्रेम होता है। परिवार में प्रेम समन्वय हो तो परिवार प्रेम की अयोध्या बन जाता है। वात्सल्य का नाम ही घर होता है ।जिस घर में प्रेम समन्वय नहीं होता है वह घर एक भवन होता है। परिवार में प्रेम सद्भाव होने से घर मंदिर बन जाता है।यह बात वैराग्य सागर जी महाराज साहब ने कही।वे पार्श्वनाथ दिगंबर जैन समाज नीमच द्वारा दिगम्बर जैन मंदिर में आयोजित धर्म सभा में बोल रहे थे ।उन्होंने कहा कि युवा वर्ग देव गुरु धर्म के संस्कारों से प्रेम करना सीखें, पैसा कमाना ही जीवन नहीं है ।जीवन निर्वाह तो पशु भी करते हैं जीवन का निर्माण मानव करता है । मुनि सुप्रभ सागर जी महाराज साहब ने कहा कि जिस परिवार में प्रेम वात्सल्य का गुण नहीं वह परिवार अधूरा होता है प्रेम सद्भाव से ही सामाजिक एकता का विकास होता है प्राचीन काल में गरीब व्यक्ति को राजा गुप्त रूप से अन्न दान कर सहयोग करते थे। व्यक्ति को पहले राष्ट्र धर्म और शांति की बात करना चाहिए तभी उसको पुण्य फल मिलता है। हम अभयदान नहीं कर सकते तो कोई बात नहीं हम छोटे-छोटे दान कर पुण्य का संग्रह कर सकते हैं। पानी का उपयोग कम कर भी हम जीव दया कर सकते हैं।परम पूज्य चारित्र चक्रवर्ती 108 शांति सागर जी महामुनि राज के पदारोहण के शताब्दी वर्ष मे परम पूज्य मुनि 108 श्री वैराग्य सागर जी महाराज एवं परम पूज्य मुनि 108 श्री सुप्रभ सागर जी महाराज जी का पावन सानिध्य मिला। उक्त जानकारी दिगम्बर चातुर्मास समिति के सचिव अजय कासलीवाल व मिडिया प्रभारी अमन विनायका ने दी।