आलेख/ विचारमंदसौर जिलामध्यप्रदेश
भाजपा की वैचारिक पृष्ठभूमि के जनक “पंडित दीनदयाल उपाध्याय”

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11 फरवरी को पुण्यतिथि–
भाजपा की वैचारिक पृष्ठभूमि के जनक “पंडित दीनदयाल उपाध्याय”
उनके विचारों को जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को अंगीकार करना चाहिए

शिक्षाविद् एवं विचारक मंदसौर
भारत अर्थात आर्यावर्त, यह प्राचीन काल से ही एक राष्ट्र होने के बाद भी छोटे-छोटे राज्यों में बँटा हुआ था और प्रत्येक राजा अपनी सीमा का विस्तार करने अथवा राज्य की सुरक्षा के लिए लगातार युद्ध रत रहता था। यह स्थिति मुगलों के शासन काल से लेकर अंग्रेजों के शासन काल तक निरंतर रही।
1947 में जब देश आजाद हुआ तो उस समय की राजनीति में समाजवाद, साम्यवाद, मार्क्सवाद,एवं पूंजीवाद को शक्तिशाली बनाने के लिए प्रत्येक राजनीतिक संगठन अपने महत्व को दर्शाने का प्रयास सिर्फ इसलिए करता रहा की राजनीतिक सत्ता को वह प्राप्त कर सके। इसी बीच भारतीय जनसंघ के पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने “एकात्म मानववाद” के सिद्धांत को राजनीति की मूलभूत आवश्यकता के रूप में प्रतिपादित किया।
एकात्म मानववाद पंडित दीनदयाल उपाध्याय की श्रेष्ठतम देन है। राजनीतिक उठापटक अथवा इस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को यह भ्रम हो जाता है कि, यह अन्य वादों का खंडन करने के लिए एकात्म- मानववाद के नाम से एक नवीन वाद अथवा नई राजनीतिक विचारधारा को उत्पन्न किया गया होगा, किंतु एकात्म मानववाद को जब देश- विदेश के बड़े बड़े राजनीतिक पंडितों ने तथा शिक्षाविदों एवं देश के अखबारों ने भारत की प्रकृति के अनुकूल तथा अनुरूप बता कर इसकी प्रशंसा की तो उस समय के कांग्रेस सहित विभिन्न राजनीतिक दल बहुत सकते में आ गए थे, किंतु पंडित जी अपनी इस प्रशंसा से बिल्कुल भी प्रभावित नहीं हुए और उन्होंने कहा ईश्वर जब किसी समाज अथवा देश का अच्छा करने वाला होता है तो उसके लिए अच्छे विचार किसी माध्यम से सबके सामने प्रस्तुत करवाता है, इसी अहंकार शून्यता एवं सादगी तथा भोलेपन के कारण वे अपने दल में ही नहीं वरन विरोधियों के बीच में भी श्रद्धा के पात्र थे, किंतु उनकी तथा उनके दल की बढ़ती हुई प्रतिष्ठा को कुछ राजनेता हजम नहीं कर पा रहे थे, क्योंकि उस समय के कांग्रेस के कुछ राजनेता उनकी ऊपर से बहुत प्रशंसा करते थे किंतु अंदर ही अंदर उनके बढ़ते हुए प्रभाव से चिंतित भी थे।
बचपन में ही माता पिता के गुजर जाने के बाद मामा के पास रहे और मामा के गुजर जाने के बाद उन्होंने अपनी पढ़ाई बहुत कठिन परिस्थितियों में भी जारी रखी तथा उन्होंने एम. ए. प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया। एक अच्छी नौकरी उन्हें मिल रही थी किंतु उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुखों को और महत्वाकांक्षाओं का परित्याग कर वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्णकालिक प्रचारक बन गए और इसके बाद भारतीय जनसंघ की स्थापना के साथ ही उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई तथा वे एक उदयीमान राजनेता, एक कुशल संगठक, चिंतक एवं एक दार्शनिक विद्वान के रूप में संपूर्ण भारतवर्ष में पहचाने जाने लगे।
एकात्म मानववाद में उन्होंने लिखा है कि- “समस्त विश्व का केंद्र मानव जाति है और उसी के चारों ओर पश्चिमी जगत का वैचारिक आंदोलन घूमता रहता है किंतु भारत में व्यक्ति को मान्यता है और समाज को भी, दोनों में परस्पर कोई विरोध नहीं है। जहां यह सिद्धांत माना गया कि प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण सुख और संपूर्ण विकास के अवसर प्राप्त हो किंतु प्रत्येक व्यक्ति को अपनी संपूर्ण योग्यताओं और क्षमताओं को स्वेच्छा से स्वयं स्फूर्त होकर समाज केंद्रित एवं समाज को समर्पित करना चाहिए, इसी प्रकार प्रकार व्यक्ति स्वतंत्रता एवं सामाजिक अनुशासन में भी पूर्ण तादात्म्य दिखाई देना चाहिए।”
समाज के अंतिम व्यक्ति का विकास यह भी समाज की जिम्मेदारी है। जिसे उन्होंने “अंत्योदय शब्द” से संबोधित किया है। भारतीय जीवन रचना, जीवन मूल्यों की रक्षा करते हुए विकास के रास्ते पर देश को ले जाना और संपूर्ण राष्ट्र एक शरीर और एक आत्मा के समान संगठित तथा संवेदनशील बने इसके साथ ही यह भारत केवल एक भूखंड मात्र नहीं है यह जीता जागता राष्ट्रपुरुष है इस प्रकार का भाव समाज के प्रत्येक व्यक्ति में उत्पन्न हो यही एकात्मता भारत को विश्व गुरु बनाने की दिशा में अग्रसर करेगा ।
श्री दीनदयाल उपाध्याय अपने राष्ट्र एवं यहां के व्यक्ति तथा समाज तक ही सीमित नहीं रहे उन्होंने अपने एकात्म- मानववाद में संपूर्ण विश्व के कल्याण की योजनाएं प्रस्तुत की, उन्होंने लिखा कि प्रत्येक राष्ट्र, भौतिक शक्ति संपन्न होने के बाद भी वह विश्व के अन्य राष्ट्रों को मानवता का एक अंग समझेगा तथा एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के संकट काल में मानवीय आधार पर अपने समस्त अहंकार तथा शत्रुता को त्याग कर सदैव मदद के लिए तैयार रहें, यही अंतरराष्ट्रीय एकात्म वाद का परिचायक होगा। उन्होंने कहा- भारतीय दर्शन विश्व बंधुत्व एवं कृण्वन्तो विश्वं आर्य तथा विश्व के कल्याण की कामना करता है, इसलिए अंतर्राष्ट्रीय एकात्मवाद की दिशा में भारत को ही पहल करनी होगी। यद्यपि भारतीय जनता पार्टी की केंद्र तथा राज्य की सरकारों ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के सपनों को पूरा करने का प्रयास किया है किंतु पंडित जी के जीवन के आदर्शों को कार्यकर्ताओं द्वारा अभी भी पूर्णता अंगीकार नहीं किया गया, क्योंकि जो सादगी सदाचार और ईमानदारी का पाठ पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने पढ़ाया था उस पाठ के अनुरूप नेताओं की कार्यशैली और आचरण कम दिखाई देते हैं।
आज पंडित दीनदयाल उपाध्याय के इसी एकात्मवाद के पद चिन्हों पर चलकर भारत विश्व गुरु बनने की दिशा में अपने कदम बढ़ा रहा है। पंडित जी की पुण्यतिथि 11 फरवरी 1968 है, इसी दिन उत्तर प्रदेश के मुगलसराय रेलवे स्टेशन पर उनका शव संदिग्ध अवस्था में पाया गया, इससे यही शंका की जा रही है की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण तथा उनके बढ़ते हुए प्रभाव और प्रवाह को रोकने हेतु किसी बड़े नेता के इशारे पर यह घृणित कार्य किया गया है, जिसकी जांच आज भी संतोषजनक तरीके से नहीं हो सकी है किंतु भारतीय जनसंघ तथा उसके बाद भारतीय जनता पार्टी की बढ़ती हुई ताकत तथा केंद्र सरकार के संकल्पों की पूर्ति जिस तरीके से हो रही है, उन्हें इससे बड़ी श्रद्धांजलि और क्या हो सकती है कि उनके स्वप्न और संकल्प धीरे-धीरे पूरे हो रहे हैं।
1947 में जब देश आजाद हुआ तो उस समय की राजनीति में समाजवाद, साम्यवाद, मार्क्सवाद,एवं पूंजीवाद को शक्तिशाली बनाने के लिए प्रत्येक राजनीतिक संगठन अपने महत्व को दर्शाने का प्रयास सिर्फ इसलिए करता रहा की राजनीतिक सत्ता को वह प्राप्त कर सके। इसी बीच भारतीय जनसंघ के पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने “एकात्म मानववाद” के सिद्धांत को राजनीति की मूलभूत आवश्यकता के रूप में प्रतिपादित किया।
एकात्म मानववाद पंडित दीनदयाल उपाध्याय की श्रेष्ठतम देन है। राजनीतिक उठापटक अथवा इस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को यह भ्रम हो जाता है कि, यह अन्य वादों का खंडन करने के लिए एकात्म- मानववाद के नाम से एक नवीन वाद अथवा नई राजनीतिक विचारधारा को उत्पन्न किया गया होगा, किंतु एकात्म मानववाद को जब देश- विदेश के बड़े बड़े राजनीतिक पंडितों ने तथा शिक्षाविदों एवं देश के अखबारों ने भारत की प्रकृति के अनुकूल तथा अनुरूप बता कर इसकी प्रशंसा की तो उस समय के कांग्रेस सहित विभिन्न राजनीतिक दल बहुत सकते में आ गए थे, किंतु पंडित जी अपनी इस प्रशंसा से बिल्कुल भी प्रभावित नहीं हुए और उन्होंने कहा ईश्वर जब किसी समाज अथवा देश का अच्छा करने वाला होता है तो उसके लिए अच्छे विचार किसी माध्यम से सबके सामने प्रस्तुत करवाता है, इसी अहंकार शून्यता एवं सादगी तथा भोलेपन के कारण वे अपने दल में ही नहीं वरन विरोधियों के बीच में भी श्रद्धा के पात्र थे, किंतु उनकी तथा उनके दल की बढ़ती हुई प्रतिष्ठा को कुछ राजनेता हजम नहीं कर पा रहे थे, क्योंकि उस समय के कांग्रेस के कुछ राजनेता उनकी ऊपर से बहुत प्रशंसा करते थे किंतु अंदर ही अंदर उनके बढ़ते हुए प्रभाव से चिंतित भी थे।
बचपन में ही माता पिता के गुजर जाने के बाद मामा के पास रहे और मामा के गुजर जाने के बाद उन्होंने अपनी पढ़ाई बहुत कठिन परिस्थितियों में भी जारी रखी तथा उन्होंने एम. ए. प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया। एक अच्छी नौकरी उन्हें मिल रही थी किंतु उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुखों को और महत्वाकांक्षाओं का परित्याग कर वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्णकालिक प्रचारक बन गए और इसके बाद भारतीय जनसंघ की स्थापना के साथ ही उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई तथा वे एक उदयीमान राजनेता, एक कुशल संगठक, चिंतक एवं एक दार्शनिक विद्वान के रूप में संपूर्ण भारतवर्ष में पहचाने जाने लगे।
एकात्म मानववाद में उन्होंने लिखा है कि- “समस्त विश्व का केंद्र मानव जाति है और उसी के चारों ओर पश्चिमी जगत का वैचारिक आंदोलन घूमता रहता है किंतु भारत में व्यक्ति को मान्यता है और समाज को भी, दोनों में परस्पर कोई विरोध नहीं है। जहां यह सिद्धांत माना गया कि प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण सुख और संपूर्ण विकास के अवसर प्राप्त हो किंतु प्रत्येक व्यक्ति को अपनी संपूर्ण योग्यताओं और क्षमताओं को स्वेच्छा से स्वयं स्फूर्त होकर समाज केंद्रित एवं समाज को समर्पित करना चाहिए, इसी प्रकार प्रकार व्यक्ति स्वतंत्रता एवं सामाजिक अनुशासन में भी पूर्ण तादात्म्य दिखाई देना चाहिए।”
समाज के अंतिम व्यक्ति का विकास यह भी समाज की जिम्मेदारी है। जिसे उन्होंने “अंत्योदय शब्द” से संबोधित किया है। भारतीय जीवन रचना, जीवन मूल्यों की रक्षा करते हुए विकास के रास्ते पर देश को ले जाना और संपूर्ण राष्ट्र एक शरीर और एक आत्मा के समान संगठित तथा संवेदनशील बने इसके साथ ही यह भारत केवल एक भूखंड मात्र नहीं है यह जीता जागता राष्ट्रपुरुष है इस प्रकार का भाव समाज के प्रत्येक व्यक्ति में उत्पन्न हो यही एकात्मता भारत को विश्व गुरु बनाने की दिशा में अग्रसर करेगा ।
श्री दीनदयाल उपाध्याय अपने राष्ट्र एवं यहां के व्यक्ति तथा समाज तक ही सीमित नहीं रहे उन्होंने अपने एकात्म- मानववाद में संपूर्ण विश्व के कल्याण की योजनाएं प्रस्तुत की, उन्होंने लिखा कि प्रत्येक राष्ट्र, भौतिक शक्ति संपन्न होने के बाद भी वह विश्व के अन्य राष्ट्रों को मानवता का एक अंग समझेगा तथा एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के संकट काल में मानवीय आधार पर अपने समस्त अहंकार तथा शत्रुता को त्याग कर सदैव मदद के लिए तैयार रहें, यही अंतरराष्ट्रीय एकात्म वाद का परिचायक होगा। उन्होंने कहा- भारतीय दर्शन विश्व बंधुत्व एवं कृण्वन्तो विश्वं आर्य तथा विश्व के कल्याण की कामना करता है, इसलिए अंतर्राष्ट्रीय एकात्मवाद की दिशा में भारत को ही पहल करनी होगी। यद्यपि भारतीय जनता पार्टी की केंद्र तथा राज्य की सरकारों ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के सपनों को पूरा करने का प्रयास किया है किंतु पंडित जी के जीवन के आदर्शों को कार्यकर्ताओं द्वारा अभी भी पूर्णता अंगीकार नहीं किया गया, क्योंकि जो सादगी सदाचार और ईमानदारी का पाठ पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने पढ़ाया था उस पाठ के अनुरूप नेताओं की कार्यशैली और आचरण कम दिखाई देते हैं।
आज पंडित दीनदयाल उपाध्याय के इसी एकात्मवाद के पद चिन्हों पर चलकर भारत विश्व गुरु बनने की दिशा में अपने कदम बढ़ा रहा है। पंडित जी की पुण्यतिथि 11 फरवरी 1968 है, इसी दिन उत्तर प्रदेश के मुगलसराय रेलवे स्टेशन पर उनका शव संदिग्ध अवस्था में पाया गया, इससे यही शंका की जा रही है की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण तथा उनके बढ़ते हुए प्रभाव और प्रवाह को रोकने हेतु किसी बड़े नेता के इशारे पर यह घृणित कार्य किया गया है, जिसकी जांच आज भी संतोषजनक तरीके से नहीं हो सकी है किंतु भारतीय जनसंघ तथा उसके बाद भारतीय जनता पार्टी की बढ़ती हुई ताकत तथा केंद्र सरकार के संकल्पों की पूर्ति जिस तरीके से हो रही है, उन्हें इससे बड़ी श्रद्धांजलि और क्या हो सकती है कि उनके स्वप्न और संकल्प धीरे-धीरे पूरे हो रहे हैं।