आध्यात्मतालरतलाम

यह विश्व कर्म प्रधान है,जो व्यक्ति जिस तरह काम करता है उसी अनुरूप फल प्राप्त होता है -संत श्री शारदा जी

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सभी धर्मों का सार सत्य, प्रेम और करुणा है -संत श्री प्रभावती जी

 

कथा सत्संग में युवाओं को आने के लिए उनका मार्ग प्रशस्त करें 

 

ताल –शिवशक्ति शर्मा

इसमें कोई संदेह नहीं कि युवाओं में कथा, सत्संग, अध्यात्म के प्रति रुचि बढ़ रही है। पहले यह माना जाता रहा है कि जो कोई काम करने लायक नहीं रहते ऐसे लोग ही सत्संगों, कथाओं में पहुंचते हैं। हमारा अनुभव है की कथाओं में काम से कम 30% लोग युवा होते हैं। ऐसे में हमें लगता है कि बदलाव आ रहा है। हम भी कथाओं में कहते-रहते हैं कि बुजुर्ग लोग थोड़ा विश्राम करें। कथा सत्संग में युवाओं को आने के लिए उनका मार्ग प्रशस्त करें। युवाओं के इस बदलाव को लेकर हम बहुत आश्वस्त हैं। हमारा मानना है कि युवा पीढ़ी को शास्त्रों का ज्ञान होना आवश्यक है। अगर आपके पास इतना समय नहीं है कि ग्रंथ खोलकर पढ़ सकें तो आजकल तकनीक का युग है। आपके हाथ में मोबाइल, लैपटॉप है, इंटरनेट पर भी सभी ग्रंथ उपलब्ध है। जब भी समय मिले, तकनीक का सदुपयोग कर कोई न कोई ग्रंथ पढ़ना चाहिए। जिस ग्रंथ में भी आपकी रुचि हो, उस ग्रंथ को नेट पर अवश्य पड़े।

यह दिव्य संदेश अखिल भारतीय सामाजिक व आध्यात्मिक संस्था ‘मानव उत्थान सेवा समिति’ की रतलाम शाखा द्वारा ग्राम तालीदाना में समिति के गजराज सिंह ठाकुर के निवास पर आयोजित मासिक सत्संग समारोह में श्री सतपाल जी महाराज की शिष्या प्रभावती बाई जी ने दिया। उन्होंने कहा सभी धर्मों का सार सत्य, प्रेम और करुणा है। यदि सभी युवा इन तीनों को आत्मसात कर लें तो वे आध्यात्मिक हो सकते हैं। इस तरह के भाव जागृत होने पर बड़ा परिवर्तन आ सकता है। अपराध भी रुक सकते हैं। अध्यात्म इन गुणों को जागृत करने का नाम है।

संत श्री शारदा जी ने ज्ञान-भक्ति,वैराग्य, गुरु-महिमा से ओतप्रोत मधुर भजन प्रस्तुत करते हुवे कहा “कर्म प्रधान विश्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फल चाखा।।”अर्थात यह विश्व कर्म प्रधान है। जो व्यक्ति जिस तरह का कर्म करता है, उसे उसी के अनुरूप फल मिलता है। जिसका मूल ठीक नहीं, उस पर फूल कभी नहीं आएगा। इस सूत्र को युवा याद रखें तो आध्यात्मिक यात्रा में आगे तक जा सकते हैं। युवा पूछते हैं सद्गुरु की क्या पहचान ? इसके तीन मापदंड है। एक जो सभी को स्वीकार करें, उसमें अहंकार न हो। दो जो दुनिया को दिखाने के लिए नहीं, अपने मन से अच्छे काम करता हो। तीन जिसकी शरण में हमें प्रसन्नता,आत्म साक्षात्कार हो और स्वतंत्रता मिले। वह जो हमें सबके और स्वयं प्रभाव से मुक्त कर खुद के स्वभाव में बनाए रखें, वही सच्चा संत है, वही सद्गुरु है, बुद्ध पुरुष है। साध्वी जी ने आगे कहा अगर अध्यात्म की राह पर चलना है तो क्रोध से बचना जरूरी है। युवाओं से मेरा कहना है कि छह जगह पर बिल्कुल भी क्रोध न करें। पहला सुबह उठते ही क्रोध न करें। दूसरा भजन-पूजन के समय क्रोध न करें। तीसरा घर से बाहर जाते समय क्रोध न करें। चौथ दफ्तर से आते समय क्रोध न करें। पांचवा बच्चों पर क्रोध न करें। छह रात्रि में सोते समय क्रोध न करें। जब आप इन छह स्थानों पर क्रोध नहीं करेंगे तो धी्रे-धीरे क्रोध आपसे छूट ही जाएगा। समिति के राम सिंह चंद्रावत, मोहन सिंह, प्रताप सिंह, देवेंद्र सिंह चंद्रावत, आशीष, जगदीश जाधव आदि अध्यात्म प्रेमी उपस्थित थे।

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