मंदसौरमंदसौर जिला
कलाल समाज द्वारा आज सहस्त्रार्जुन भगवान की जयंती मनाई जाएगी

मन्दसौर। सर्ववर्गीय कलाल समाज सामाजिक समिति के द्वारा अपने आराध्य देव राज राजेश्वर सहस्त्रार्जुन भगवान की पावन जयंती पर आज 19 नवम्बर रविवार को होटल इंडियन चेरी, सीतामऊ फाटक, रिलायंस पेट्रोल पंप के पास मंदसौर कार्यक्रम आयोजित होंगे। प्रातः 10 बजे हवन, पूजन, महाआरती होगी तत्पश्चात् समापन समारोह एवं प्रसादी का आयोजन होगा।
समिति ने समाज के सभी वरिष्ठजन, पुरुष एवं महिलाएं उपस्थित होकर आराध्य देव का शुभाशीष प्राप्त करने की अपील की है। उक्त जानकारी विकास बसेर ने दी।
समिति ने समाज के सभी वरिष्ठजन, पुरुष एवं महिलाएं उपस्थित होकर आराध्य देव का शुभाशीष प्राप्त करने की अपील की है। उक्त जानकारी विकास बसेर ने दी।
दत्तात्रे पुराण, रामायण, एवं कार्तविर्य अर्जुन पुराण के अनुशार कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन एक चंद्रवंशी राजा थे, जिन्होंने हैहय वंश की 10वीं पीढ़ी में महाराज कृतविर्य के घर माता पद्मिनी के गर्भ से जन्म लिया था. अपने पिता के बाद वह महिष्मति के राजा बने. सभी पर विजय प्राप्त करने वाले पराक्रमी राजा होने से वें राजराजेश्वर कहलाएं.
चन्द्रवंशी क्षत्रिय वंशावलीः- विष्णु, ब्रह्मा, अत्रि, दत्तात्रेय, चंद्रमा, दुर्वाशा हुए महाराजा चंद्रमा, महारानी तारा, रोहणी से हुए महाराजा बुध-महारानी इला से महाराजा पुरुरवा महारानी अप्सरा उर्वशी से महाराजा आयु, महारानी प्रभा से चक्रवर्ती सम्राट महाराजा नहुष, महारानी बिरजा से महाराजा ययाति, महारानी देवयानी एवं महारानी शर्मिष्ठा दो रानियां थीं। महारानी देवयानी से यदु एवं तुर्वसु हुए। महारानी शर्मिष्ठा से हह्यु, अनु एवं महाराजा पुरु प्रतापी राजा हुए।
महाराजा यदुवंश का विस्तार से वर्णन श्री हरिवंश पुराण महाभारत खिल भाग के 33वें अध्याय में भी महाराजा यदुवंश का वर्णन किया गया है। महाराजा यदु के 5 देवोपम पुत्र रत्न पैदा हुये जिसमें 1. सहस्त्रजीत, 2. क्रोष्टु, 3. ययोद, 4. नील, 5. अंजिक हैं। महाराजा सहस्रजीत से हैहयवंश की शुरुआत हुई एवं महाराजा क्रोष्टु से यदुवंश की शुरुआत हुई। महाराजा सहस्त्रजीत से ही सोमवंशी, चंद्रवंशी आदि 14 शाखाओं में विभक्त हो गया। एवं महाराजा क्रोष्टु के वंश में भगवान श्रीकृष्ण एवं बड़े भाई वलदाऊ अवतरित हुए।
महाराजा सहस्त्रजीत/सहस्त्राद, महारानी विमला वती से हैहय, हय, वेणुहय हुये। महाराजा हैहय-महारानी एलावती से महाराजा धर्मनेत्र, महारानी विंदावती से महाराजा कार्त, महारानी कुंतीदेव से महाराजा सहंजन, महारानी चम्पावती से महाराजा महिष्मान, महारानी सुभद्रा से महाराजा भद्रश्रेण्य, महारानी महारानी दिव्या से महाराजा दुर्दम, महारानी ज्योतिषमति से महाराजा कनक, महारानी राखो देवी से महाराजा कृतवीर्य, महारानी कौशकी एवं पद्मावती से चक्रवर्ती सम्राट कार्तवीर्यार्जुन हुए।
स्वयं परशुराम जी ने माता सीता के स्वयंवर के समय में भगवान राम द्वारा टूटी धनुष के प्रसंग में लक्ष्मण जी से संवाद करते हुए कहा कि सहस्त्रबाहु भुज छेदन हारा, परसु बिलोकु महीप कुमारा। इसका वर्णन तुलसीकृत रामायण के बालकांड के 244 व 245 पर भगवान श्रीराम, लक्ष्मण परशुराम संवाद में पढ़ा-देखा जा सकता है। परशुराम जी ने सिर्फ भुजाओं का छेदन करने की बात कही है। शेषाअवतार लक्ष्मण जी से यह नहीं कहा कि मैंने सहस्रबाहु का वध किया है।
कबीर दास के बीजक 8वें शब्द की 11वीं पंक्ति में वर्णित है- परशुराम क्षत्रिय नहीं, मारे छल माया किन्हीं। अर्थात परशुराम छल, छद्म, मायाजाल, मायावी उपाय करने के बाद भी पराजित नहीं कर सके। वर्तमान में इसका साक्ष्य महेश्वर स्थित सहस्त्रबाहु की समाधि पर मंदिर है। इससे स्पष्ट है कि सहस्त्रवाहु के पुत्र जयध्वज के राज्याभिषेक के बाद तपस्या योग के बाद समाधि ली थी, इसलिए यह समाधि स्थल मंदिर कहलाता है। आज भी सभी समाज के लोग मन्नत मानते हैं। मन्नत पूर्ण होने पर देशी घी का चिराग जलाने हेतु देशी घी दान करते हैं जो निरंतर चिराग जलता रहता है। सहस्त्रबाहु के संहार की मान्यता का खंडन करते हुए महाकवि कालिदास जी द्वारा लिखित रघुवंश महाकाव्य का इंदुमती स्वयंवर प्रसंग है। इनके पद 6/42 जिसका भावार्थ है कि सहस्त्रवाहु ने परशुराम के फरसे की तीखी धार को भी अग्निदेव की सहायता से कमल पत्र के कोमल धार से भी कम था, क्योंकि इनकी राजधानी महेश्वर की रक्षा स्वयं अग्निदेव खुद करते थे, इसलिए महेश्वर में सहस्त्रबाहु को हराना असंभव था। कुछ पुराणों में अलग-अलग मत हैं।
देवी भागवत पुराण में उल्लेख है कि सहस्त्रावाहु और परशुराम में ही नहीं, बल्कि किसी ग्रंथों में सहस्त्रार्जुन के पुत्रों एव भृगुवंशियों द्वारा धन की खींचातानी के कारण युद्ध हुआ था। जगदग्नि ऋषि का वध सहस्रबाहु के पुत्रों द्वारा हुआ था।
बह्म वैवर्त पुराण के अनुसार युद्ध में सहस्त्रार्जुन ने अनेकों बार परशुराम को मूर्छित किया था। सहस्त्रार्जुन के हाथ में सुरक्षा कवच था जिसके कारण सहस्त्रार्जुन को हराना असंभव था। देवताओं द्वारा ब्राह्मण का रूप धारण करके सुरक्षा कवच दान में मांग लिया था।
वायु पुराण का अप्रकाशित खंड महिष्मति महात्म के अध्याय नंबर 13 में वर्णित है। जब सहस्त्रार्जुन के 4 भुजा से थे तो अपने गुरु दत्तात्रेय का स्मरण किया तो भगवान दत्तात्रेय ने सहस्त्रबाहु को स्मरण कराते हुए कहा कि अंश चक्रा अवतार का स्मरण करो। इतना कहते ही भगवान शंकर तुरंत प्रकट हो गये। सहस्त्रबाहु को दर्शन देते हुए बोले- जाओ नर्मदा नदी में स्नान करके आओ। जब सहस्त्रबाहु नर्मदा नदी से स्नान करके भगवान शंकर के सम्मुख आए तो भगवान शंकर ने उन्हें अपने में समाहित कर लिया। उसी स्थान पर आज राज राजेश्वर भगवान सहस्त्रार्जुन का मंदिर का निर्माण हुआ है।
पुराणों के अनुसार 7 चक्रवर्ती सम्राटों में गणना की जाती है- 1. 1. भगीरथ, 2. मांधाता, 3. नहुष, 4. सगर, 5. कार्तवीर्यार्जुन, 6. भरत एवं 7. युधिष्ठिर। युद्ध में अगर पराजित हुए होते हैं या उनका वध किया गया होता तो चक्रवर्ती सम्राटों में भगवान कार्तवीर्यर्जुन की गणना नहीं की जाती। इससे भी प्रमाणित होता है कि उनका वध नहीं हुआ था। शास्त्रों के अनुसार जिस महापुरुष में 6 गुणों का समावेश हो संपूर्ण ऐश्वर्य, धर्म ,यश, श्री, ज्ञान एवं वैराग्य से परिपूर्ण थे ग्रंथों में भगवान विष्णु के अंश चक्रा अवतार कार्तवीर्यार्जुन को बताया गया है, इसीलिए भगवान के रूप में संबोधित किया जाता है।
भगवान सहस्त्रार्जुन के जन्मोत्सव पर देशी घी का कम से कम 11 दीप अपने घरों में अवश्य जलायें। सम्भव हो तो भगवान शिवजी के मंदिर में भी दीपदान करें। घर में महालक्ष्मी जी का आशीर्वाद रहेगा, क्योंकि भगवान सहस्त्रार्जुन धन के भी देवता है।

(लेखक अखिल भारतीय सर्ववर्गीय महासभा के प्रदेश अध्यक्ष हैं।)
https://www.aapkiummid.com/2020/11/Sahastrabahu-Arjun-was-part-of-Lord-Vishnus-cycle.html