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ज्ञानी व गुणवान व्यक्तियों को प्रणाम करने से पुण्य कर्म का संचय होता है- संत श्री पारसमुनिजी

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मन्दसौर। संसार में कोई व्यक्ति ज्ञानीजनों व गुणीजनों को प्रमाण करता है तो वह पुण्य कर्म का संचय करता है। गुणवान व्यक्ति नमस्कार या प्रणाम किये जाने के योग्य है उसे प्रणाम करने से आपके पुण्यकर्म बढ़ते है, गुणी वहीं है जिसने राग द्वेष को समाप्त कर अपना जीवन पवित्र पावन बना लिया है। ऐसे व्यक्ति को प्रणाम करना जिनशासन में पुण्य कर्म को बढ़ाने वाला कहा गया है।
उक्त उद्गार परम पूज्य आचार्य श्री विजयराजजी म.सा. के आज्ञानुवर्ती शिष्य श्री पारसमुनिजी म.सा. ने शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में आयोजित धर्मसभा में कहे। आपने बुधवार को कहा कि जिन शासन में व्यक्ति पूजा नहीं बल्कि गुण पूजा की महत्ता बताई गई है। गुण पूजा को फलदायक बताया गया है।
पुण्य अर्जित करने के 9 साधन- जैन आगमों में पूज्य संचय के 9 साधन बताये गये है। इनमें से 5 देने से संबंधित है व 4 करने से संबंधित है। अन्न, पानी, वस्त्र, भूमि, शयन, सामग्री देने से अर्थात दान करने से पुण्य अर्जित होता है। मन, वचन, काया को शुद्ध पावन रखने से पुण्य अर्पित होता है। ज्ञानीजनों व गुणीजनों को प्रणाम करना भी पुण्य अर्जित करने का साधन है। इस प्रकार पुण्य अर्पित करने के ये 9 साधन है। हमें इनकी महत्ता समझना है।
कर्तव्य भाव को समझें-संत श्री अभिनवमुनिजी ने कहा कि जीवन में अधिकारों की बजाय कर्तव्यों को महत्व दे। जीवन में सदैव अच्छा बोले, अच्छा देखने को ही प्रयास करे। निंदा सुनने व करने से बचे। जीवन में जहां भी सत्संग हो, संतों का सानिध्य मिले वहां जाये, सिनेमा की बजाय सत्संग को महत्व दे। सहजता सरलता का जीवन जिये। धर्मसभा में मांगलिक भी हुई। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक श्राविकाओं ने संतों की अमृतमयी वाणी का धर्मलाभ लिया।

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