शरद का अलंकरण!!

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शरद का अलंकरण!!
नभ तरण-ताल मध्य-भाग एक श्वेत सी रजनी
नीलीमा आभा शशि-लोचन कौमुद्रि उदासिनी।
सरसी-नीर रजत सम आभा चंद्रिका प्रतिबिंब
मंद-समीर गतिमान अति तरंगिनि धवल-डिंब।
शरद-सुहावन ऋतु-मनभावन अध-चंद्र प्रारंभ
देह विदेह सिहर मन थर थर काँप काँप आरंभ।
शशि-शिखा शशि-शेखर शशि-श्वेत अह्लादिनी
सुमन कुसुम कलि अंबर विरजित गज-चाँदनी।
पुर्णमदा पुर्णामृत शरद पूनम षोडष कलायुक्त
सरस-सुंदर मनोरम अविरल सर्वथा पाप-मुक्त।
श्वेत पायसम उन्मुक्त नभ तले संपूर्ण रात्रिशीत
रोग-दोष निवारण औषधि चंद्रप्रभा हृदय-प्रीत।
शरद योगिनियाँ भ्रमण करेंगी आज पहनकर शीत आवरण।
भजन-कीर्तन इष्ट-पूजा चंद्रकला वसुधा-नभ रात्रि-जागरण।।
जिस भाव के उद्दीपन से स्वयं का अस्तित्व पुनः निर्मित और आभासित हो! ऐसी अनुकृति में पूर्णतः समाहित होना..यही प्रेम है। जैसे आश्वनी मास के शुक्लपक्ष की अंतिम तिथि में चन्द्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है.. स्वयं के अस्तित्व की पूर्णतः प्राप्ति से अमृत का सृजन होता है.. यही प्रेम है। यही शरद पूर्णिमा है। यही रास पूर्णिमा है..।।