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सिंदपन में कलश यात्रा के साथ हुआ श्रीमद् भागवत कथा का शुभारंभ पं नारायण जी के मुखारविंद से

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भागवत पोथी के साथ इंद्रदेव का भी हुआ आगमन क्षेत्र वासियों में खुशी की लहर
मंदसौर- भगवान श्री सांवरिया सेठ की असीम कृपा से सावरा माता के पावन सानिध्य में भगवान श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव एवं क्षेत्र में अच्छी वर्षा के लिए श्रीमद् भागवत कथा का भव्य आयोजन ग्राम सिंदपन एवं समस्त क्षेत्र वासियों के द्वारा किया जा रहा है श्रीमद् भागवत कथा का शुभारंभ भागवत पोथी एवं कलश यात्रा के साथ हुआ भागवत पोथी के साथ-साथ इंद्रदेव का भी आगमन हुआ पूरे क्षेत्र में निरंतर अच्छी वर्षा से समस्त भक्तों के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई मां सावरा माता ने कथा के प्रथम दिवस में ही भक्तों की अर्जी को स्वीकार किया
श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस में व्यास पीठ से श्री हनुमंत भागवत कर्मकांड परिषद के संस्थापक श्री महाकाल भैरव अखाड़ा संघ के राष्ट्रीय संरक्षक भागवत आचार्य पंडित श्री मुकेश शर्मा नारायण जी मंदसौर वाले ने कहा कि भागवत कथा का सच्चा श्रवण ही भक्तों की अर्जी को भगवान तक पहुंचाने का सबसे बड़ा मार्ग है पूरे क्षेत्र के भक्तों के द्वारा कम वर्षा से चिंतित होते हुए मां सावरा माता के प्रांगण में अच्छी वर्षा की कामना को लेकर श्रीमद् भागवत कथा का भव्य आयोजन किया सांवरा माता ने कलश यात्रा से पहले ही भक्तों की अर्जी को स्वीकार किया एवं इंद्रदेव ने अपनी कृपा बरसाई समस्त भक्तों के द्वारा इंद्रदेव का भी भव्य स्वागत किया
आपके भाग्य में लिखा दिया उसे कोई छीन नहीं सकता
पंडित नारायण जी के द्वारा आत्मदेव ब्राह्मण का सुंदर वर्णन करते हुए कहा कि भगवान ने जो आपके भाग्य में लिखा दिया उसे कोई छीन नहीं सकता और जो भाग्य में नहीं वह कभी मिल नहीं सकता वह अटल सत्य है एक ब्राह्मण आत्मदेव जो तुंगभद्रा नदी के तट पर रहते थे। ये बड़े ज्ञानी समस्त वेदों के विशेषज्ञ और श्रौत-स्मार्त कर्मों में निपुण थे। इनकी एक पत्नी थी जिसका नाम धुन्धुली था,धुन्धुली कुलीन और सुंदर थी लेकिन अपनी बात मनवाने वाली, क्रूर और झगड़ालू थी। आत्मदेव जी के जीवन में धन, वैभव सब कुछ था लेकिन सिर्फ एक चीज की कमी थी। इनके जीवन में कोई संतान नहीं थी। जिस बात का इन्हें दुःख था। आत्मदेव ब्राह्मण संतान की प्राप्ति ना होने से अपने जीवन को समाप्त करना चाहते थे अपने भक्तों को संकट में देखते हुए भगवान संत रूप अपना कर आत्मदेव ब्राह्मण को फल रूपी प्रसाद दिया लेकिन आत्मदेव ब्राह्मण की पत्नी धुन्धुली उस प्रसाद का भी परिक्षण करना चाहती थी इस कारण वह प्रसाद अपने घर की गौ माता को खिलाकर अपनी ही बहन का बच्चा लाकर जिसका नाम धुंधकारी रखती है वही गौ माता को भी प्रसाद के फल से संतान की प्राप्ति होती है जिनका नाम गोकर्ण महाराज रखा जाता है
कुपुत्र के कारण मां को भी अपना जीवन त्यागना पड़ा-
गोकर्ण महाराज संत के आशीर्वाद से संत रूप में ही जन्म लेते हैं और सदैव अपनी भक्ति में लीन रहते हैं लेकिन धुंधकारी अपने नाम के स्वरूप ही पाप कर्म एवं गलत कर्म के मार्ग पर अपना जीवन जीता है इन्हीं कर्मों की वजह से धुंधकारी की मां को कुपुत्र के कारण अपना जीवन त्यागना पड़ा है एवं आत्म देव ब्राह्मण अपना सब कुछ छोड़कर भगवान की भक्ति के लिए वन चले जाते हैं वहीं बुरी शक्तियों ने ही धुंधकारी का अंत कर दिया जिसके कारण मोक्ष प्राप्त ना हुआ अपने मोक्ष की आशा को लेकर दर-दर भटकता रहा धुंधकारी लेकिन अपने भाई के मोक्ष के लिए गोकर्ण महाराज ने संतो के सानिध्य में श्रीमद् भागवत कथा का भव्य आयोजन किया जिसमें एक बांस की छण में बैठकर धुंधकारी ने एकाग्र मन से श्रीमद् भागवत कथा का श्रवण किया इस कारण धुंधकारी को मोक्ष प्राप्त हुआ एवं गोकर्ण महाराज के साथ समस्त भक्तों को जीवन पूर्ण करने के बाद स्वर्ग की प्राप्ति हुई
भक्ति एवं मोक्ष का मार्ग श्रीमद् भागवत कथा-
इस कारण कहा जाता है भगवान की भक्ति एवं मोक्ष का मार्ग सिर्फ और सिर्फ श्रीमद् भागवत कथा का सच्चा श्रवण ही तय करता है इस कारण भक्तों को अपने जीवन में श्रीमद् भागवत कथा का श्रवण निश्चित करना चाहिए
भागवत कथा के प्रथम दिवस में आयोजन समिति के सदस्यों के द्वारा व्यास पीठ पर विराजित भागवत आचार्य पंडित श्री मुकेश शर्मा नारायण जी का स्वागत सम्मान किया भागवत कथा के प्रथम दिवस की आरती समस्त भक्तों के द्वारा की गई समस्त जानकारी परिषद सदस्य मनीष शर्मा के द्वारा दी गई