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संस्कृत भाषा और शैव नाथ ब्राह्मण्य संस्कृति के संरक्षण में पूर्व बरुआला की दो युवती रूपश्री और राजश्री नाथ का विशेष योगदान

संस्कृत भाषा और शैव नाथ ब्राह्मण्य संस्कृति के संरक्षण में पूर्व बरुआला की दो युवती रूपश्री और राजश्री नाथ का विशेष योगदान

श्रीभूमि, असम:

असम के श्रीभूमि जिले के पूर्व बरुआला की दो संस्कृति प्रेमी युवती रूपश्री नाथ और राजश्री नाथ संस्कृत भाषा की शिक्षा, शास्त्र चर्चा और शैव नाथ ब्राह्मण्य संस्कृति के प्रचार-प्रसार में विशेष भूमिका निभा रही हैं। संस्कृत भाषा के प्रति उनका गहरा अनुराग और शास्त्रीय साहित्य के प्रति निष्ठा ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दिलाई है।

वर्तमान में दोनों बहनें त्रिपुरा के अगरतला स्थित एकलव्य परिसर में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के अंतर्गत आई-टीईपी पाठ्यक्रम अर्थात् बी.ए. बी.एड.. में अध्ययनरत हैं। संस्थागत शिक्षा के साथ-साथ वे श्री श्री शिव गीता, श्री श्री चण्डी और श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ एवं संबंधित शास्त्रीय विषयों पर दक्षता के साथ चर्चा करती हैं। उनका यह शास्त्राभ्यास संस्कृत भाषा और भारतीय धार्मिक परंपरा के प्रति युवा पीढ़ी में रुचि बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो रहा है।

रूपश्री और राजश्री के शास्त्रीय पाठ और सांस्कृतिक कार्यों की मान्यता स्वरूप निखिल भारत रुद्रज ब्राह्मण सम्मिलनी के महासचिव पंडित प्रवर उपेन्द्र कुमार देवनाथ सहित विभिन्न संगठनों और विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया है। यह सम्मान भविष्य में संस्कृत शिक्षा और शास्त्र चर्चा के क्षेत्र में उन्हें और अधिक प्रोत्साहन प्रदान करेगा।

केवल स्वयं तक सीमित न रहकर, ये दोनों बहनें अपने गांव पूर्व बरुआला में घर आकर इच्छुक विद्यार्थियों को श्री श्री शिव गीता, श्री श्री चण्डी और श्रीमद्भगवद्गीता पाठ के साथ-साथ संस्कृत भाषा की कक्षाएं भी देती हैं। इस माध्यम से वे ग्रामीण विद्यार्थियों में संस्कृत भाषा, धार्मिक साहित्य और प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति रुचि जागृत करने का प्रयास कर रही हैं।

उल्लेखनीय है कि रूपश्री और राजश्री के पिता उत्तर-पूर्व भारत में शैव नाथ ब्राह्मण्य संस्कृति के निरलस और निष्ठावान सेवक, लेखक और धर्मगुरु श्री सुदीप नाथ शास्त्री हैं और माता श्रीमती रूपिता नाथ हैं। पारिवारिक सांस्कृतिक वातावरण और पिता के धार्मिक-सामाजिक कार्यों ने उनकी शास्त्र चर्चा और अपनी परंपरा के प्रति अनुराग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

नाथ संप्रदाय के इतिहास, समाज और संस्कृति तथा शैव नाथ ब्राह्मण्य परंपरा के प्रचार-प्रसार में रूपश्री और राजश्री नाथ का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ प्राचीन शास्त्र, संस्कृत भाषा और अपनी सांस्कृतिक विरासत को धारण कर आगे बढ़ने का उनका यह प्रयास निस्संदेह प्रशंसनीय है।

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