विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर अफीम फसल से चिराई और लुहाई का दौर हुआ शुरू

विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर अफीम फसल से चिराई और लुहाई का दौर हुआ शुरू
चौमहला/झालावाड़ | रिपोर्ट – रमेश मोदीगंगधार क्षेत्र में काला सोना कही जाने वाली अफीम की खेती इन दिनों अपने सबसे अहम् चरण में पहुंच चुकी है। यहां अफीम की खेती केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि गहरी धार्मिक आस्था और परंपराओं से जुड़ा कार्य मानी जाती है। खेतों में अफीम के पौधों पर डोडा पकने लगा है और इसके साथ ही विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर चिराई और लुहाई का दौर भी शुरू हो गया है।
रविवार को कोलवी गांव के कृषक करण सिंह परमार ने परिवार सहित खेत पर काली माता की स्थापना कर विधिवत पूजा-अर्चना की। पंडित बाबू व्यास ने मंत्रोच्चार के साथ पूजा सम्पन्न कराई। अफीम की खेती में चीरा लगाने से पहले खेत की मेड़ पर काली माता जी की पूजा की जाती है। शुभ मुहूर्त में पांच या सात डोडों की विशेष पूजा की परंपरा निभाई जाती है, इसके बाद ही पके हुए डोडों पर चीरा लगाया जाता है।
किसानों के अनुसार आने वाले कुछ दिनों तक चिराई की प्रक्रिया नियमित रूप से जारी रहेगी। चीरा लगाने के बाद डोडों से निकलने वाले दूध को एकत्र किया जाता है। इसके लिए किसान सूर्योदय से पहले ही परिवार के साथ नंगे पांव खेतों में पहुंचते हैं। विशेष प्रकार के औजार से डोडों की चिराई कर छरपले में अफीम का दूध इकट्ठा किया जाता है।
किसान लक्ष्मण सिंह गुर्जर सिंघला और करण सिंह ने बताया कि इस दौरान फसल की विशेष निगरानी भी रखी जाती है, ताकि पशु, पक्षी या तस्कर किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचा सकें। क्षेत्र में अफीम उत्पादन किसानों की आर्थिक रीढ़ माना जाता है, वहीं इससे जुड़ी धार्मिक मान्यताएं इस खेती को एक विशेष पहचान भी प्रदान करती हैं।


