झालावाड़पचपहाड़ (Pachpahar)

भारी ट्रैफिक जाम को चीरते  पहुँचा संकल्प… नेत्रदान से रोशन हुई दो ज़िंदगियाँ

भारी ट्रैफिक जाम को चीरते  पहुँचा संकल्प… नेत्रदान से रोशन हुई दो ज़िंदगियाँ

भवानीमंडी। कभी-कभी इंसान चला जाता है, लेकिन जाते-जाते ऐसी रोशनी दे जाता है जो वर्षों तक किसी की दुनिया उजली करती रहती है। शनिवार को रामगंजमंडी में कुछ ऐसा ही भावुक और प्रेरणादायक दृश्य देखने को मिला, जब स्वर्गीय लीला देवी गुप्ता (57 वर्ष) के नेत्रदान ने दो नेत्रहीनों के जीवन का अंधकार दूर करने की राह खोल दी।

जाम में अटका सफर, पर नहीं रुका संकल्प

कोटा से नेत्र प्राप्ति के लिए निकली शाइन इंडिया फाउंडेशन की टीम दरा क्षेत्र में भीषण जाम में फंस गई। समय तेजी से निकल रहा था और अंतिम संस्कार का समय नज़दीक आ रहा था। ऐसे में डॉक्टर कुलवंत गौड़ ने अदम्य साहस दिखाते हुए लगभग 3 किलोमीटर पैदल चलकर दरा रेलवे स्टेशन तक का रास्ता तय किया और वहां से ट्रेन पकड़कर समय पर रामगंजमंडी पहुँचे।

सैकड़ों लोगों की मौजूदगी में नियत समय पर नेत्रदान की प्रक्रिया पूर्ण हुई। उसके बाद ही अंतिम यात्रा रवाना हुई। यह दृश्य वहां उपस्थित हर व्यक्ति की आंखें नम कर गया।

एक चर्चा बनी जीवनदायी निर्णय

जानकारी के अनुसार, एक विवाह समारोह में भारत विकास परिषद की सदस्या शकुंतला गुप्ता को लीला देवी के निधन का समाचार मिला। उनके साथ भवानीमंडी के नेत्रदान प्रभारी कमलेश गुप्ता दलाल भी मौजूद थे। दोनों ने तुरंत परिवार से नेत्रदान का आग्रह किया।समाजसेवी सोच रखने वाले परिवार ने बिना देर किए सहमति दे दी। परिवार के इस निर्णय ने शोक की घड़ी को मानवता की मिसाल में बदल दिया।

समाज में जागरूकता का परिणाम-

नेत्रदान प्रक्रिया में राधेश्याम गुप्ता, मोनु माहेश्वरी और प्रेमचंद गुप्ता सहित कई समाजजन ने सहयोग किया।

कमलेश गुप्ता ने बताया कि यह मेड़तवाल समाज का 75वां नेत्रदान है, वहीं रामगंजमंडी का 73वां नेत्रदान। समाज में नेत्रदान और रक्तदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए मेड़तवाल रक्त-नेत्र मित्र समिति का गठन किया गया है, जो प्रत्येक शोक संदेश पर परिवार से संपर्क कर नेत्रदान के लिए प्रेरित करती है।

संजय विजावत के अनुसार, शाइन इंडिया फाउंडेशन द्वारा लगातार आयोजित कार्यशालाओं और जागरूकता गोष्ठियों के कारण अब नेत्रदान का संदेश घर-घर तक पहुँच चुका है।

शोक में भी सेवा का प्रकाश-

लीला देवी भले ही इस दुनिया से विदा हो गईं, लेकिन उनकी आँखों की रोशनी अब किसी और की दुनिया को रंगों से भर देगी।

भीषण जाम, समय का दबाव और परिस्थितियों की बाधाओं के बीच लिया गया यह नेत्रदान संकल्प यह संदेश देता है—

“मृत्यु अंत नहीं, किसी के जीवन की नई सुबह भी बन सकती है।”

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