रतलामजावरा

पूर्व सीएमओ नीता जैन व लिपिक विजय सिंह शक्तावत को रिश्वत मामले में चार-चार साल की सजा

रिपोर्टर जितेंद्र सिह चंद्रावत जडवासा

पूर्व सीएमओ नीता जैन व लिपिक विजय सिंह शक्तावत को रिश्वत मामले में चार-चार साल की सजा

ढोढर। रतलाम जिले के जावरा में बहुचर्चित नगर पालिका रिश्वतकांड में विशेष न्यायालय रतलाम ने बड़ा फैसला सुनाते हुए जावरा नगर पालिका की तत्कालीन सीएमओ नीता जैन एवं लिपिक विजय सिंह शक्तावत को चार-चार वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। यह फैसला 19 फरवरी 2026 को विशेष न्यायाधीश द्वारा सुनाया गया। न्यायालय ने दोनों को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी करार दिया।

क्या था मामला?

मामला मार्च 2021 का है, जब जावरा नगरपालिका में ठेकेदार के फाइनल भुगतान के बदले रिश्वत मांगने की शिकायत सामने आई थी। पेटी कांट्रेक्टर पवन भावसार ने आरोप लगाया था कि भुगतान जारी करने के एवज में रिश्वत की मांग की जा रही है। शिकायत के बाद लोकायुक्त संगठन उज्जैन ने ट्रैप कार्रवाई की योजना बनाई।

12 मार्च 2021 को हुई थी ट्रैप कार्रवाई

12 मार्च 2021 को लोकायुक्त उज्जैन की टीम ने जावरा नगरपालिका कार्यालय में दबिश दी। कार्रवाई के दौरान लिपिक विजय सिंह शक्तावत की जेब से 18,500 रुपये की रिश्वत राशि से भरा लिफाफा बरामद किया गया। जांच में सामने आया कि यह राशि तत्कालीन सीएमओ नीता जैन को दी जानी थी।

कार्रवाई का नेतृत्व लोकायुक्त इंस्पेक्टर बसंत श्रीवास्तव ने किया था। उस समय उन्होंने बताया था कि रिश्वत मांगने से संबंधित बातचीत की रिकॉर्डिंग भी जांच टीम के पास मौजूद है, जो मामले में महत्वपूर्ण साक्ष्य बनी।

कोर्ट का फैसला

लगभग पांच वर्ष तक चले न्यायिक परीक्षण के बाद विशेष न्यायालय ने दोनों आरोपियों को दोषी पाया। कोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत चार-चार वर्ष का सश्रम कारावास एवं अर्थदंड की सजा सुनाई। न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि लोकसेवकों द्वारा पद का दुरुपयोग कर अवैध रूप से धन की मांग करना गंभीर अपराध है और ऐसे मामलों में कठोर दंड आवश्यक है, ताकि प्रशासनिक तंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहे।

प्रशासनिक हलकों में चर्चा

इस फैसले के बाद जावरा सहित रतलाम जिले के प्रशासनिक व राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। लंबे समय से लंबित इस मामले में आए निर्णय को भ्रष्टाचार के विरुद्ध सख्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि इस निर्णय से शासन-प्रशासन में पारदर्शिता को बढ़ावा मिलेगा और भविष्य में अधिकारी-कर्मचारी ऐसे कृत्यों से बचेंग।

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