प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय में ब्रह्मा बाबा की पुण्यतिथि ज्ञानामृत के साथ श्रद्धांजलि अर्पित कर मनाई

प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय में ब्रह्मा बाबा की पुण्यतिथि ज्ञानामृत के साथ श्रद्धांजलि अर्पित कर मनाई
सीतामऊ।प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय सीतामऊ में संस्थापक ब्रह्मा बाबा की पुण्यतिथि बड़े ही श्रद्धा से मनाई गई।इस अवसर ब्रह्माकुमारी कृष्णा दीदी ने अपने ज्ञानमृत में कहा कि जब जब धर्म कि ग्लानी होती है तब भगवान आता है। शिवरात्रि हम भगवान का जन्म दिन मनाते हैं।तो भगवान ने जन्म लिया है। ऐसे ही दादा लेखराज के तन में 1936 में प्रवेश किया और लकीराज से नाम प्रजापिता ब्रह्मा बन गए। दादा लखीराज हीरे-जवाहरात के व्यापारी थे। और जब उनका जीवन परमात्मा के प्रति समर्पित हो गया तब से उनका सभी धन संपत्ति से मोह छुट गया। और परमात्मा से जुड़ गए। परमात्मा ने बाबा को अपना दिव्य ओजस प्रदान किया। फिर धीरे धीरे दादा के पुरा परिवार भी जुड़ गया। जब दादा लखीराज ने जब शुरुआत कि तो अपने इस ग्रुप मंडली का नाम ॐ ओम् नाम रखा। धीरे धीरे ओम मंडली से लोग जुड़ने लगे। दादा लखीराज राजस्थान के माउंट आबू पर्वत के जंगल को अपने साधना का स्थान बनाया ऐसे ही दादा लखीराज को परमात्मा का साक्षात्कार होता गया और संस्था आगे बढ़ती गई। और संस्था बढ़ते बढ़ते देश और विदेश में प्रजापति ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के नाम से चल रही है। दादा लखीराज ने सभी जीवन परमात्मा से जोड़ने का संदेश दिया। दादा लखीराज ने शरीर छोड़ दिया पर उनकी आत्मा हमारे बीच में ही है। और हमें देखती और अच्छे रास्ते पर चलने का आशीर्वाद प्रदान करते है।बहिन प्रिती दीदी ने कहा कि यह पुरा महिना ज्ञान उपवास व्रत का महिना है। इंदौर से पुरा चार्ट आया है। उसके अनुसार हमको चलना है। बाबा जब कराची छोड़ कर मधुवन पांडव भवन पहुंचे और बाबा ने उस बंजर भूमि जंगल में कमल पुष्प से महका दिया। सभी आज से संकल्प लें कि बाबा कि मुरली ध्यान में आना है।
दीदी ने कहा कि लोग यहां आते हैं तो जल्दी करते हैं पर जब उनको आधे घंटे से ज्यादा समय हो जाता है तो उनका और रुकने का मन करता है। यह सब बाबा का आशीर्वाद आनंद है।
जगदीश भाई नाटाराम ने अपने उद्बोधन में कहा कि 57 वां स्मृति दिवस है आज बाबा अपने शरीर से विरक्त हुए थे। बाबा आज भी है शरीर से नहीं पर अविरक्त होकर हम सभी बच्चों कि पालना करते थे।आज जो भी दादीया है वे पहले मात्र 14-15 साल कि कन्याएं थीं। बाबा ने उनके अंदर ऐसा ज्ञान भर दिया कि आज 140 देशों में ज्ञान का विस्तार चल रहा है। और सभी का आशीर्वाद दे रहे हैं। इस अवसर पर गीत मधुवन कि धरनी सजा कर कहां छुप गए बाबा कांटों को फुल बनाकर कहा छुप गए बाबा …..सुनाया ।
पूर्व शिक्षिका श्रीमती गुणवती कोठारी ने उद्बोधन में कहा कि 1998 में पहली बार स्काउट केप के दौरान बाबा के द्वार माउंट आबू में ग ई थी उस समय वहां इतनी शांति देखने को मिली कि वह कही नहीं देखी।
दो टीवी चैनल चलते हैं।सुबह में आप ज्ञान कि मुरली घर बैठे ही प्राप्त कर सकते हैं। पहले 44 शाखाएं थी अब 174 शाखाएं चल रही है।
दो मिनिट रोजाना बाबा को देखते हैं तो आंखें ठीक हो जाती है। ऐसे ही हाथ मलने के बाद मस्तक दाई बाई और लगाते है तो नसें खुलने लगती है। रोजाना कुछ समय लगातार पुरे हाथ से ताली बजाने से शरीर में क ई बिमारीयां ठीक हो जाती है।
इस अवसर पर भ्राता गौरव जैन ने गीत ओ मधुवन वाले बाबा ओ मीठे वाले बाबा…..सुनाया।कार्यक्रम में दशरथ पाटीदार तितरोद हरिनारायण सोनी, ललीता दीदी कयामपुर ने भी अपना उद्बोधन दिया। इस अवसर पर वरिष्ठ समाजसेवी राधेश्याम घाटिया लक्ष्मीनारायण मांदलिया, यशवंत माली गोपाल घाटिया राजू पंडित दलावदा, दिनेश सेठिया, राजूराम पंथी सहित बड़ी संख्या में उपस्थित महिला पुरुषों ने बाबा को श्रद्धांजलि अर्पित कर संस्थापक बाबा लेखराज के ऊपर निर्मित फिल्म देखी।



