आलेख/ विचारअंतर्राष्ट्रीयमंदसौरमध्यप्रदेश

40 वें दिन युद्ध विराम को स्वीकार, अब कट्टरपंथी संगठनों को नियंत्रित रखने की जिम्मेदारी

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ट्रंप ने युद्ध विराम का श्रेय चीन को दिया। यह अमेरिका या ईरान की नहीं बल्कि मानवता की जीत है।

महायुद्ध में भी भारत ने अपनी ताकत दिखायी।

महायुद्ध के 40 वें दिन यानी 8 अप्रैल को ईरान ने युद्ध विराम को स्वीकार किया है। ईरान की ओर से कहा गया कि अमेरिका और इजरायल ने हमले करना बंद कर दिया है इसलिए अब ईरान भी खाड़ी के किसी भी देश में अमेरिकी ठिकानों और इजरायल पर हमला नहीं करेगा। इसके साथ ही ईरान ने घोषणा भी है कि होर्मुज मार्ग से मालवाहक जहाज और तेल टैंकर आसानी से गुजर सकेगें। ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध 28 फरवरी को शुरू हुआ था। इस युद्ध के दौरान कई बार अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह विराम के प्रस्ताव रखे, लेकिन हर बार ईरान ने इंकार कर दिया। ईरान के राष्ट्रपति मोहम्मद पजेश कियान ने दो टूक शब्दों में कहा कि युद्ध की शुरुआत अमेरिका ने की थी, लेकिन युद्ध कब खत्म होगा यह हम तय करेंगें। अमेरिका ने हमारे सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामनेई सहित 10 बड़े नेताओं और सैन्य अधिकारियों की जो हत्या की है उसका बदला अमेरिका और इजराइल से लिया जाएगा। अमेरिकी हमलों के जवाब में ईरान ने खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर जबरदस्त हमले किए। यहां तक की इजरायल में भी मिसाइल बरसायी गई। इस युद्ध से पूरी दुनिया में तब हाहाकार मच गया जब ईरान ने अपने कब्जे वाले समुद्र के होर्मुज मार्ग को बंद कर दिया। चूंकि इसी मार्ग से तेल और गैस के टैंकरों का परिवहन होता है इसलिए पूरी दुनिया में उथल-पुथल मच गई। अमेरिका ने जहां ईरान के तेल भंडारों को तबाह कर दिया वही ईरान ने भी खाडी के मुस्लिम देशों के तेल भंडारों के पर मिसाइल गिराई। 8 अप्रैल को पहला अवसर रहा जब ईरान ने युद्ध विराम पर सहमति प्रकट की। युद्ध के 40 वें दिन अब दुनिया ने भी राहत की सांस ली है, लेकिन अब ईरान की यह जिम्मेदारी है कि वह हिजबुल्लाह, हमास, अलकायदा जैसे कट्टरपंथी संगठनों को नियंत्रित करे। ईरान के संरक्षण के कारण ही ऐसे कट्टरपंथी संगठन आतंकवादी वारदातें से करते हैं। भले ही यह युद्ध अमेरिका ने लड़ा है, लेकिन इसके पीड़े इजरायल की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस इस युद्ध में इजरायल ने मुस्लिम कट्टरपंथी संगठनों को नुकसान पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी अब अमेरिका भले ही खुश हो की उसने ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोक दिया है, लेकिन इजरायल इस बात से खुश है कि उसने गाजा और लेबनान में कट्टरपंथी संगठनों ने कमर तोड़ दी है।

मानवता की जीत:-

युद्ध विराम को ईरान और अमेरिका ने अपनी अपनी जीत बताया है। ईरान के लोग तो जश्न भी मना रहे वहीं अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि मैंने शुरू में ही कहा था कि यह युद्ध 4-5 हफ्ते चलेगा। अमेरिका का उद्देश्य पूरा हो गया इसलिए अब युद्ध विराम किया जा रहा है। ट्रंप ने कहा कि ईरान को युद्ध विराम के लिए चीन ने राजी किया। यानि यह दोनों ही देश युद्ध विराम को अपनी-अपनी जीत बता रहे है, लेकिन असल में यह जीत मानवता की है। इस युद्ध में निर्दोष लोग बेवजह मारे जा रहे थे। ईरान जब खाड़ी देशों में और अमेरिका-इजरायल, ईरान व लेबनान पर हमले कर रहा था, तब इंसानों की ही मौत हो रही थी। आर्थिक रूप से हुए नुकसान की भरपाई तो की जा सकती है, लेकिन इंसान की मौत की भरपाई कभी नहीं हो सकती। युद्ध के दौरान ईरान के एक स्कूल में मिसाइल गिरने से 200 से भी ज्यादा बच्चों की मौत हो गई। जिस परिवार के बच्चे की मौत हुई उस परिवार के दर्द को न ईरान के और न अमेरिका के शासक समझेगें। यह सही है कि इस युद्ध में अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश का मुकाबला ईरान ने किया। लेकिन इस मुकाबले की कीमत ईरान को चुकानी पड़ी। ईरान को दुबारा से खड़ा होने में बहुत समय लगेगा।

भारत की ताकत:-

इस महायुद्ध में जब विकसित देश भी लडख़ड़ा गए, तब भारत जैसे देश ने स्वयं को मजबूती के साथ खड़े रखा। तेल की कीमतों में वृद्धि न होना यह दर्शाता है कि भारत ने बड़ी समझदारी के साथ हालातों से मुकाबला किया है। कामर्शियल गैस को छोड़कर सभी वस्तुओं की सप्लाई सामान्य बनी रहीं। युद्ध के दौरान ही भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मोहम्मद पजेश कियान ने कई बार फोन पर बात की। इतना ही नहीं ईरान ने भारत को मित्र देश बताते हुए होर्मुज मार्ग से भारतीयों जहाजों को गुजरने की अनुमति भी दी। यानि महायुद्ध में भी भारत ने अपनी ताकत का प्रदर्शन किया।

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