जबलपुरआलेख/ विचारमध्यप्रदेश

कला के नाम पर अपना उल्लू सीधे करते बड़े कलाकार- राकेश यादव की कलम से

उन हाथों की दास्तां जिन्हें वक्त और बाजार ने भुला दिया

कला बनाम कलाकार – भारतीय सिनेमा के स्वर्ण युग का जब भी जिक्र होता है, हमारी जुबां पर मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर या किशोर कुमार जैसे महान गायकों के नाम आते हैं। हम अक्सर कहते हैं कि “यह नौशाद साहब की धुन है” या “आर.डी. बर्मन का संगीत है।” लेकिन क्या हमने कभी उस संगीत के पीछे बजने वाली उस वायलिन की तान, उस गिटार के तार या उस तबले की थाप के पीछे छिपे हाथों को पहचानने की कोशिश की? *गुमनाम है कोई* इसी कड़वे सच को उजागर करती है कि कैसे हम उन ‘बैकग्राउंड कलाकारों’ को भूल जाते हैं, जिनके बिना संगीत का यह भव्य महल खड़ा होना असंभव था।

सामूहिक तपस्या-

आज के डिजिटल युग में संगीत एक कंप्यूटर चिप में सिमट गया है, लेकिन एक दौर वह था जब एक गाने की रिकॉर्डिंग के लिए स्टूडियो में ५०-५० वायलिन वादक एक साथ बैठते थे। उन ५० हाथों का एक ही लय और एक ही सुर में चलना किसी चमत्कार से कम नहीं था। यदि एक भी कलाकार का हाथ हल्का सा भी डगमगाता, तो पूरी रिकॉर्डिंग फिर से करनी पड़ती थी। विडंबना यह है कि उन ५० लोगों में से आज हम एक का भी नाम नहीं जानते। ये कलाकार संगीत की उस नींव की तरह हैं जो जमीन के नीचे दबी रहती है ताकि ऊपर की इमारत चमक सके। उनकी विचारधारा केवल काम करने की नहीं, बल्कि एक ‘सामूहिक ऊर्जा’ (Collective Energy) पैदा करने की थी, जो किसी भी धुन को ‘अमर’ बना देती थी।

अधिकार और रॉयल्टी का अभाव–

आज गायक और संगीतकारों को उनके गीतों के लिए रॉयल्टी मिलती है, लेकिन उन संगीतकारों (Musicians) को उनके हक का एक हिस्सा भी नहीं मिलता जिन्होंने उस गाने में अपनी आत्मा फूँकी थी। रॉयल्टी तो बहुत दूर की बात है, उन्हें उचित ‘श्रेय’ (Credit) तक नहीं दिया गया। ‘मधुबन में राधिका नाचे’ जैसे कालजयी गीत में तबला किसने बजाया या ‘तीसरी मंजिल’ के उस प्रसिद्ध ड्रम सोलो के पीछे किसके हाथ थे, यह जानकारी आज के श्रोताओं के पास नहीं है। यह केवल आर्थिक लाभ का प्रश्न नहीं है, बल्कि एक कलाकार के सम्मान और उसकी पहचान का प्रश्न है।

नवाचार और नए वाद्ययंत्रों की खोज–

इन बैकग्राउंड कलाकारों ने केवल बजाया ही नहीं, बल्कि संगीत में नए रंग भी भरे। केर्सी लॉर्ड जैसे दूरदर्शी कलाकार ने ‘हम दोनों’ के थीम सांग में ‘ग्लॉकनस्पील’ (Glockenspiel) नामक एक जर्मन वाद्ययंत्र का प्रयोग किया। उनका यह प्रयोग इतना सफल रहा कि वह धुन उस फिल्म की पहचान बन गई। इसी प्रकार होमी मुल्लन ने दिखाया कि कैसे साधारण चीजों से भी संगीत निकाला जा सकता है। इन कलाकारों की यही ‘सृजनात्मकता’ थी जो एक साधारण धुन को ‘मास्टरपीस’ में बदल देती थी। यदि ये कलाकार अपनी बुद्धि और कौशल का प्रयोग न करते, तो क्या आज का संगीत इतना समृद्ध होता?

संघर्ष और अडिग समर्पण–

इन कलाकारों का जीवन केवल सुरों की चमक-धमक नहीं था, बल्कि लगन मेहनत भी था।

होमी मुल्लन की कहानी–

हृदयस्पर्शी है, जहाँ वे बताते हैं कि शुरुआती दिनों में उनके पास भोजन तक के पैसे नहीं थे। उन्होंने और उनकी पत्नी ने चने खाकर दिन गुजारे, लेकिन संगीत का साथ नहीं छोड़ा। उनका त्याग इसलिए महान है क्योंकि वे जानते थे कि उन्हें कभी वह ‘स्टारडम’ नहीं मिलेगा जो पर्दे पर दिखने वाले चेहरों को मिलता है। उनकी विचारधारा ‘निष्काम कर्म’ की थी—कला की सेवा करना, फल की चिंता किए बिना।

ज़रीन शर्मा और सरोद की मधुरता–

ज़रीन शर्मा जैसी महिला कलाकारों ने उस दौर में अपनी जगह बनाई जब इस क्षेत्र में महिलाओं का होना अत्यंत कठिन था। उन्होंने ६ वर्ष की अल्पायु से ही संगीत की साधना शुरू की। इन कलाकारों ने अपना पूरा जीवन एक साज को दे दिया ताकि हमारे फिल्मी गाने एक विशिष्ट व्यक्तित्व प्राप्त कर सकें। परंतु आज जब हम उन गीतों को सुनते हैं, तो सरोद की वह मिठास तो याद रहती है, लेकिन ज़रीन शर्मा का नाम इतिहास के पन्नों में कहीं खो गया है।

बहाुदर नांजी गुमनामी के अंधेरे में एक दीप–

इस पूरी दास्तां का सबसे कारुणिक हिस्सा ९४ वर्षीय बहादुर सोहराब जी नांजी का है। वह कलाकार जिसने ‘पाकीज़ा’ जैसी फिल्म का बैकग्राउंड संगीत रचा और ‘याद ना जाए बीते दिनों की’ में ऑर्गन बजाया, आज एक पुराने अपार्टमेंट में एकाकी जीवन व्यतीत कर रहे हैं। जिस कलाकार के हाथों ने करोड़ों लोगों को सुकून दिया, आज वह समाज की विस्मृति का शिकार है। यह हमारी कला बिरादरी और समाज की विफलता है कि हमने अपने अनमोल रत्नों को इस तरह उपेक्षित छोड़ दिया।

एक समाप्त होता युग–

आज का युग ‘सिंथेटिक’ संगीत का है। कंप्यूटर सॉफ्टवेयर ने उन सैकड़ों वाद्ययंत्र बजाने वालों की जगह ले ली है। पहले साल के ३६५ दिन स्टूडियो में जो रौनक रहती थी, आज वहाँ सन्नाटा है। डिजिटल संगीत में वह ‘आत्मा’ नहीं है जो एक जीवित कलाकार के स्पर्श से निकलती है। जब एक संगीतकार किसी वाद्ययंत्र को छूता है, तो वह केवल सुर नहीं निकालता, बल्कि अपनी संवेदनाएं भी उसमें उड़ेल देता है। मशीनों के इस दौर में हम उस ‘मानवीय स्पर्श’ को खोते जा रहे हैं।

सम्मान की पुनर्स्थापना–

हमें यह समझना होगा कि कला केवल वही नहीं है जो पर्दे पर चमकती है। कला उस ‘पृष्ठभूमि’ में भी है जो उस चमक को आधार प्रदान करती है। यदि आज भारतीय संगीत विश्व स्तर पर अपनी पहचान रखता है, तो इसमें उन गुमनाम कलाकारों का सबसे बड़ा योगदान है। हमारा यह नैतिक दायित्व है कि हम उन्हें केवल एक ‘साज बजाने वाला’ न समझें, बल्कि उन्हें वह सम्मान और श्रेय दें जिसके वे वास्तविक हकदार हैं।

इन गुमनाम नायकों की दास्तां हमें याद दिलाती है कि

“संगीत की हर अमर धुन के पीछे एक अनसुनी चीख है, एक अनसुलझी पहेली है और एक समर्पित कलाकार का पूरा जीवन है।”

हमें उन्हें भूलना नहीं चाहिए, क्योंकि यदि उनकी वह निस्वार्थ कला न होती, तो आज का यह सांस्कृतिक परिवेश हमारे सामने इस गौरवशाली रूप में नहीं होता।

–राकेश यादव घूमन्तु गोल्डी

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