
रिपोर्टर जितेन्द्र सिंह चद्रांवत जडवासा
विकास की अर्थी पर सवार बछोड़िया; नरकीय जीवन जीने को मजबूर हजारों ग्रामीण , न सड़कें, न सफाई, न अस्पताल
जावरा। विधानसभा क्षेत्र रतलाम जिले के बछोड़िया गांव आज आधुनिक भारत की चमक से कोसों दूर, आदिम युग की समस्याओं से लहूलुहान है। हजारों की आबादी वाला यह गांव प्रशासनिक फाइलों में भले ही ‘आदर्श’ नजर आए, लेकिन हकीकत यह है कि यहाँ विकास की अर्थी निकल चुकी है। युवाओं का भविष्य, किसानों की मेहनत और गांव का स्वाभिमान, सब कुछ सिस्टम की लापरवाही के कीचड़ में दफन है।
रिश्तों पर संकट और ‘खंडहर’ की छवि
गांव की सड़कें इस कदर जर्जर हैं कि बाहरी लोग अब यहाँ आने से कतराते हैं। ग्रामीणों का दर्द है कि गांव की बदहाली देखकर लोग अपनी बेटी का रिश्ता यहाँ करने से साफ मना कर देते हैं। हर कोई यही कहता है— “इस खंडहर गांव में कौन रहेगा?” यह अपमान यहाँ के युवाओं के मनोबल को छलनी कर रहा है।
गंदगी का अंबार और जल-निकासी का अभाव+
गांव के भीतर की स्थिति और भी भयावह है। रास्तों पर उचित सफाई की कोई व्यवस्था नहीं है। नालियां चोक होने के कारण गंदा पानी सड़कों पर बह रहा है, जिससे पैदल चलना भी दूभर है। गांव में कचरा प्रबंधन की कोई ठोस व्यवस्था न होने से जगह-जगह गंदगी के ढेर लगे हैं, जो बीमारियों को न्योता दे रहे हैं।
स्वास्थ्य सुविधाओं का अकाल
हजारों की आबादी होने के बावजूद गांव में हॉस्पिटल (स्वास्थ्य केंद्र) की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है। आपात स्थिति में ग्रामीणों को शहर की ओर भागना पड़ता है। जर्जर रास्तों के कारण एंबुलेंस और जननी एक्सप्रेस समय पर नहीं पहुँच पाती, जिससे प्रसव के दौरान महिलाओं और गंभीर मरीजों की जान हमेशा जोखिम में बनी रहती है।
बेबस किसान और बेरोजगार युवा-
मजबूर किसान: किसान सब्जी तो लगा सकता है, लेकिन रास्तों की बदहाली के कारण वह समय पर मंडी नहीं जा सकता, जिससे उसकी फसल खेतों में ही सड़ जाती है।
बेरोजगार युवा: आवागमन ठप होने से युवा कोई नया व्यवसाय शुरू नहीं कर पा रहे। आलम यह है कि पढ़े-लिखे डिग्रीधारी युवा आज दिहाड़ी मजदूरी करने को मजबूर हैं।
लाइफलाइन पर ‘ताला’: पुलिया का संकट
धतुरिया-सुखेड़ा मार्ग: मंडी जाने वाले इस मुख्य रास्ते पर पुलिया का अभाव है। बारिश आते ही मंडी का संपर्क पूरी तरह कट जाता है।
मांडवी नदी मार्ग: राजस्थान (प्रतापगढ़, दलोट, चुपना) को जोड़ने वाले इस व्यावसायिक मार्ग पर पुलिया न होने से सैकड़ों मजदूरों की रोजी-रोटी संकट में है।
बछोड़िया से बछोड़िया फंटा: 1.5 किलोमीटर का यह मुख्य रास्ता पूरी तरह ध्वस्त है।
प्रतिभाओं के लिए न मैदान, न लाइब्रेरी
गांव के स्कूल में न तो खेल का मैदान (Ground) है और न ही प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोई लाइब्रेरी। युवाओं के पास न अपनी शारीरिक प्रतिभा निखारने का साधन है और न ही मानसिक विकास का। इसके साथ ही गांव में मांगलिक भवन और श्मशान घाट पर शेड जैसी बुनियादी सुविधाओं का वर्षों से अभाव है।
ग्रामीणों कि चेतावनी: ‘काम नहीं, तो वोट नहीं’
प्रशासन की लंबी चुप्पी से आक्रोशित ग्रामीणों ने अंतिम चेतावनी दी है। यदि मानसून से पहले (जिसमें अभी 3 महीने शेष हैं) इन प्रमुख सड़कों, सफाई और पुलिया का काम शुरू नहीं हुआ, तो पूरा गांव उग्र आंदोलन करेगा और आने वाले समय में ‘चुनावी बहिष्कार’ जैसा कड़ा कदम उठाया जाएगा।
तीखे सवाल:-
- धतुरिया और मांडवी नदी पर पुलिया निर्माण मानसून से पहले शुरू क्यों नहीं हो रहा? क्या प्रशासन किसी हादसे का इंतज़ार कर रहा है?
- गांव में अस्पताल, मांगलिक भवन और खेल मैदान जैसी मूलभूत सुविधाएं कब तक कागजों से निकलकर धरातल पर आएंगी?
- गंदगी और चोक नालियों के कारण फैल रही बीमारियों का जिम्मेदार कौन है?
- दो साल पहले बनी सड़क में हुए भ्रष्टाचार की जांच कब होगी?



