नई पीढ़ी को चाहिए कि वह मातृभाषा में पढ़ने लिखने की रुचि जगाये और हमारी भाषा को जीवित बनाए- प्रोफेसर श्री दुबे

शब्दकोश की परंपरा और शब्दावली में परिवर्तन पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी उज्जैन में सम्पन्न
उज्जैन: सम्राट् विक्रमादित्य विश्वविद्यालय, उज्जैन की हिंदी अध्ययनशाला द्वारा पीएम उषा योजना के अंतर्गत एमपी कॉन, भोपाल के सहयोग से छह दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। सोमवार को भारत में शब्दकोश की परंपरा और शब्दावली में परिवर्तन पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न हुई।संगोष्ठी के मुख्य अतिथि वरिष्ठ विज्ञान लेखक एवं मध्यप्रदेश के पक्षी पुस्तक के लेखक प्रो जे पी एन पाठक थे। अध्यक्षता वरिष्ठ विज्ञान लेखक डॉ भोलेश्वर दुबे, इंदौर ने की। सारस्वत अतिथि डॉ कल्पना गवली वडोदरा, गुजरात, पूर्व कुलपति प्रो बालकृष्ण शर्मा, प्रभारी कुलपति प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा, पद्मश्री डॉ भगवतीलाल राजपुरोहित, प्राचार्य डॉ हरीश व्यास, वरिष्ठ विज्ञान लेखक डॉ किशोर पवार इंदौर, प्रो जगदीश चंद्र शर्मा आदि ने संगोष्ठी में प्रकाश डाला। यह संगोष्ठी विख्यात कोशकार डॉ बच्चूलाल अवस्थी ज्ञान की स्मृति को समर्पित थी।
कार्यक्रम में अतिथियों को अंग वस्त्र, सूत की माला, प्रतीक चिह्न एवं साहित्य भेँट कर उनका सारस्वत सम्मान किया गया।
सारस्वत अतिथि एमएस यूनिवर्सिटी वड़ोदरा की कला संकायाध्यक्ष प्रो कल्पना गवली ने अपने उद्बोधन में कहा की आज भाषा को संजोने की आवश्यकता है। भाषा का संक्षिप्तीकरण नहीं करना चाहिए, उससे भाषा खत्म होती है। हमें अगर भाषा को जीवित रखना है तो हमें उसका प्रयोग करना चाहिए। शब्दकोश में हमारी संस्कृति, ज्ञान और परंपरा बसी हुई होती है इसलिए हमें शब्दकोशों का उपयोग करना चाहिए।
प्रसिद्ध प्राणी वैज्ञानिक डॉ जे पी एन पाठक ने अपने वक्तव्य में बताया कि पहले शब्दकोश हमारी मां और दूसरा शब्दकोश गुरु होता है। आजकल हिंग्लिश का प्रयोग चल पड़ा है, उससे नई पीढ़ी को बचना चाहिए। हमें हिंदी को बचाना और उसे संभालना चाहिए। शब्द केवल शब्द नहीं होते वे समय के साथ अर्थ बदलते रहते हैं।
पूर्व कुलपति आचार्य बालकृष्ण शर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारत में शब्दकोशों की अत्यंत समर्थ परंपरा है। कोश के विभिन्न अर्थ होते हैं। शब्दकोश शब्दों के संचयन और अर्थों के सम्यक् बोध के महत्वपूर्ण साधन हैं। कोशों के स्वरूप पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि शब्दकोश के क्षेत्र में निघंटु, निरुक्त, अमरकोश, अनेकार्थ संग्रह, शब्दरत्नदीप, शब्दकल्पद्रूम, रत्नमाला इत्यादि की समृद्ध परंपरा है।
प्रभारी कुलपति प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि शब्द मानवीय ज्ञान का साकार रूप और अंधकार से प्रकाश की ओर ले का साधन है। शब्द विचारों, भावनाओं और ज्ञान को व्यक्त करने का माध्यम हैं। वे संवाद की कुंजी हैं। उन्हीं के माध्यम से हम ज्ञान और सूचनाओं का आदान-प्रदान करने के साथ सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाते हैं। शब्दकोश बौद्धिक ज्ञान की उन्नति के साथ अभिव्यक्ति की स्पष्टता और मानकीकरण को आधार देते हैं। तकनीक और वैश्वीकरण के दौर में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैचारिक एकता स्थापित करने में कोशों की भूमिका अद्वितीय है।
डॉ. किशोर पंवार ने अपने उद्बोधन में हिंदी में विज्ञान लेखन के विविध आयाम विषय पर चर्चा करते हुए कहा कि विज्ञान लेखन में शीर्षक आकर्षक होना चाहिए, उसमें विज्ञान और ऐतिहासिक जानकारी होनी चाहिए। विज्ञान को सहज ग्राह्य बनाने के लिए विविध भाषाओं का ज्ञान और मुहावरेदार भाषा का प्रयोग किया जाना चाहिए। हमें विभिन्न मुहावरे और कहावतें में कारण ढूंढने की कोशिश करनी चाहिए। कोई भी बात बिना वैज्ञानिक कारण के नहीं होती है।
पद्मश्री प्रो भगवतीलाल राजपुरोहित ने अपने उद्बोधन में कहा कि निरुक्त में शब्दों से अर्थ तक पहुंचने की पद्धति बताई गई है। अगर हम तत्सम शब्द को समझ गए तो तद्भव को समझना कठिन नहीं होता है।
विज्ञान लेखक प्रो भोलेश्वर दुबे, इंदौर ने शब्दकोशो पर बात करते हुए बताया कि मनुष्य का वरदान है वाणी। जब आप किसी एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद करते हैं तो आपको उस ग्रंथ को जीना पड़ता है आप उसके भाव को जब अच्छे तरीके से समझ पाएंगे तभी उसका किसी अन्य भाषा में अनुवाद कर सकते हैं। आपको अनुवाद के लिए एक से अधिक भाषाओं का समुचित ज्ञान होना आवश्यक है। नई पीढ़ी को चाहिए कि वह मातृभाषा में पढ़ने लिखने की रुचि जगाये और हमारी भाषा को जीवित बनाए रखें।
प्राचार्य डॉ हरीश व्यास ने अपने वक्तव्य में कहा कि मनुष्य चलता फिरता शब्दकोश होता है। वह अपने हावभाव के द्वारा भी बातों को व्यक्त करने की क्षमता रखता है हिंदी के महत्व को बढ़ाने के लिए विज्ञान में हिंदी शब्दावली का प्रयोग करना चाहिए।
विज्ञान लेखक डॉ सुशील जोशी ने कहा कि भाषा का विकास लोग करते हैं। भाषा वैज्ञानिक बस उसे विश्लेषित करते हैं। भाषा एक निजी और सामुदायिक अनुभव है। तकनीकी सत्र में वरिष्ठ शिक्षाविद् प्रो राकेश ढंड, विज्ञान लेखक डॉ सुशील जोशी, प्रो हरिमोहन बुधौलिया, डॉ अलका व्यास उज्जैन आदि ने व्याख्यान दिए। लोक गायक श्री सुंदरलाल मालवीय ने भर्तृहरि – पिंगला प्रसंग पर लोकगीत की प्रस्तुति की।
कार्यक्रम का संचालन प्रो जगदीश चंद्र शर्मा और डॉ. प्रतिष्ठा शर्मा ने किया। आभार प्रदर्शन शोधार्थी पूजा परमार ने किया।



