विडंबना: उपमुख्यमंत्री के क्षेत्र कि स्वास्थ्य सेवा वेंटिलेटर पर, निजी वाहन से घायल को ले जाना पड़ा मंदसौर

विडंबना: उपमुख्यमंत्री के क्षेत्र कि स्वास्थ्य सेवा वेंटिलेटर पर, निजी वाहन से घायल को ले जाना पड़ा मंदसौर
मल्हारगढ़। उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा की बुधवार को विधानसभा क्षेत्र के प्रवास के दौरान एक तरफ मानवता देखने को मिली, तो दूसरी तरफ उनके ही क्षेत्र की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खुल गई। ग्राम सूठोद के पास सड़क दुर्घटना देख उपमुख्यमंत्री ने अपना काफिला रुकवाया, घायलों (युवक व महिला) की कुशलक्षेम पूछी और उन्हें तुरंत अस्पताल भिजवाया। लेकिन असल संघर्ष अस्पताल पहुँचने के बाद शुरू हुआ।
108 का फोन करने पर हमेशा सभी एम्बुलेंस व्यस्त बताती है, खड़ी रही ‘सांसद वाली’ गाड़ी- प्राथमिक उपचार के बाद डॉक्टरों ने घायल की गंभीर स्थिति को देखते हुए उसे मंदसौर रेफर कर दिया। अस्पताल स्टाफ और परिजनों ने बार-बार 108 एम्बुलेंस को फोन किया, लेकिन संतुष्टि पूर्वक जवाब नही मिला। हैरानी की बात यह है कि मल्हारगढ़ थाना परिसर में सांसद निधि से नगर परिषद को मिली एम्बुलेंस खड़ी रही, लेकिन वह सिस्टम की कागजी उलझनों और ‘सशुल्क’ नियम के कारण मौके पर काम नहीं आ सकी। अंततः, परिजनों को भारी परेशानी के बीच निजी वाहन का इंतजाम कर घायलों को जिला अस्पताल ले जाना पड़ा।
सैलाना भेज दी यहाँ की एम्बुलेंस?-नगर में चर्चा है कि मल्हारगढ़ अस्पताल में अटैच रहने वाली 108 एम्बुलेंस को रतलाम के सैलाना में भेज दिया गया है। क्षेत्रीय जनता में इस बात को लेकर गहरा आक्रोश है कि आखिर उपमुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र की सुविधाओं में कटौती क्यों की गई? क्या अधिकारी इतने लापरवाह हैं कि उपमुख्यमंत्री के क्षेत्र में भी वैकल्पिक व्यवस्था करना जरूरी नहीं समझा? सूत्र बताते है कि NRHM की टीम द्वारा रतलाम ब्लॉक में निरीक्षण के दौरान सैलाना की गाड़ी खराब होने के कारण प्रदेश में संचालित जय अम्बे कंपनी द्वारा मल्हारगढ़ की 108 एम्बुलेंस छतीसगढ़ पासिंग 2411 नंबर की गाड़ी जो 2013 से यथास्थान क्षेत्र में चल रही थी जो काफी अच्छी सुविधा प्रदान कर रही थी । जिसे वर्तमान में प्राइवेट कंपनी द्वारा सैलाना की गाड़ी खराब होने की दशा में वहाँ अटेच कर दी है । जानकारी यह भी मिली है कि कई 108 एम्बुलेंस गाड़िया खराब होने की दशा में वेल्टीलेटर पर पड़ी है । शासन को चाहिए कि ऐसी वेल्टीलेटर पर चल रही कंपनी का ठेका निरस्त कर अन्य कंपनी को दिया जाए ।
विवाद का केंद्र बन रहा अस्पताल- एम्बुलेंस की कमी के कारण अक्सर घायल के परिजनों और अस्पताल के डॉक्टरों व नर्सों के बीच एम्बुलेंस को लेकर विवाद होता है। दो दिन पहले भी एक मरीज को एम्बुलेंस न मिलने पर निजी वाहन से ले जाना पड़ा था। जनता का सवाल है कि क्या आम आदमी की जान की कोई कीमत नहीं है?
प्रमुख सवाल जो प्रशासन को चुभेंगे:- जब मल्हारगढ़ वीआईपी क्षेत्र है, तो यहाँ की एम्बुलेंस दूसरे जिले में क्यों भेजी गई?, नगर परिषद की एम्बुलेंस आपातकाल में ‘सशुल्क’ और ‘कागजी अनुमति’ के इंतजार में थाना परिसर में क्यों खड़ी रहती है? क्या अधिकारियों की इस लापरवाही की जानकारी उपमुख्यमंत्री को दी गई है?
संवेदनशीलता ‘काफिले’ तक सीमित क्यों?– यह बेहद चिंताजनक है कि प्रदेश के उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा को सड़क पर उतरकर घायलों की मदद करनी पड़ती है, लेकिन उनके जाते ही सिस्टम की संवेदनशीलता दम तोड़ देती है। जिस मल्हारगढ़ को आदर्श विधानसभा क्षेत्र होना चाहिए, वहां की जीवनदायिनी ‘108 एम्बुलेंस’ का सैलाना ट्रांसफर कर दिया जाना किसी बड़े प्रशासनिक खेल की ओर इशारा करता है।
विमान और हेलीकॉप्टर से चलने वाले अधिकारियों को शायद यह अंदाजा नहीं कि एक गरीब ग्रामीण के लिए निजी वाहन का प्रबंध करना कितना कष्टकारी होता है। सांसद निधि से मिली एम्बुलेंस का थाना परिसर में खड़ा होकर ‘सशुल्क’ और ‘कागजी आदेशों’ का इंतजार करना जनता के साथ क्रूर मजाक है। क्या उपमुख्यमंत्री के संज्ञान में यह बात है कि उनके द्वारा अस्पताल भिजवाए गए घायलों को आगे ले जाने के लिए सरकारी पहिए उपलब्ध नहीं थे? अगर वीआईपी क्षेत्र में सिस्टम का यह हाल है, तो प्रदेश के दूरदराज के अंचलों की कल्पना ही डरावनी है।
जवाबदेही तय होनी चाहिए,चाहे वह स्वास्थ्य विभाग के आला अफसर हों या एम्बुलेंस को ‘शो-पीस’ बनाकर रखने वाली नगर परिषद।
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