कहां जाएं वन्य प्राणी ? एक ओर पौधरोपण का दिखावा, दूसरी ओर उजड़ते प्राकृतिक आवास

कहां जाएं वन्य प्राणी ? एक ओर पौधरोपण का दिखावा, दूसरी ओर उजड़ते प्राकृतिक आवास
-रघुराजसिंह सिसौदिया
किटियानी मंदसौर
मंदसौर जिले में नीलगाय एवं जंगली सुअर तथा आवारा गायों से किसानों की फसलों को काफी हानि हो रही है। दिनो दिन यह समस्या बढ़ती जा रही है, यह समस्या नीमच, मंदसौर, रतलाम, आगर, शाजापुर, राजगढ़ आदि जिलों में काफी मात्रा में है। शाकाहारी वन्य प्राणियों का बढ़ने का मूल कारण मांसाहारी वन्य प्राणियों का अभाव है, मंदसौर जिले में केवल भानपुरा तहसील के गांधीसागर अभ्यारण्य एवं उससे लगे वन्य क्षेत्र को छोड़कर बाकी सात तहसील (गरोठ, शामगढ़, सुवासरा, सीतामऊ, दलौदा, मंदसौर एवं मल्हारगढ़) के वन क्षेत्र नगण्य है चूंकि वन क्षेत्र नगण्य है। अतः मांसाहारी वन प्राणियों का रहवास स्थल नहीं है।
यदा कदा तेंदुए जिले में प्रवेश करते है वे समीप प्रतापगढ़ एवं चित्तोड़ जिले के वन क्षेत्र जो कि मंदसौर जिले की सीमा से लगा हुआ है से आते है लेकिन मंदसौर में गांधी सागर को छोड़कर ऐसा कोई सुरक्षित स्थान नहीं है जहां यह निवास कर सकें। ऐसी स्थिति में शाकाहारी वन्य प्राणी (नीलगाय, चिंकारा और सुअर) जो कि तेजी से बढ़ते है क्योंकि इन पर प्राकृतिक कंट्रोल नहीं है पूरा इको सिस्टम गडबड है।
मंदसौर जिले में गांधी सागर को छोड़कर जो कुछ वन क्षेत्र है वहां पर भी इंसानी आबादी का दखल बहुत है। अतः कोई वन्य प्राणी बसेरा करना भी चाहे तो कर नहीं सकता । रेवास देवड़ा के जंगल में मांसाहारी वन्य प्राणी बसने की संभावना है लेकिन वहां भी पवन चक्की लगने एवं पहाड़ पर वन क्षेत्र में आवाजाही का सुगम रास्ता होने से बसेरा बनने से पहले ही उजड़ रहा है। अभी पिछले दिनों मंदसौर शहर में तेंदुआ प्रवेश कर गया था जिसे वन विभाग की टीम द्वारा रेसक्यू किया गया।
जंगल में विशेषकर रात्रि में वाहनों की लाईट, हॉर्न बजाना या इंजनों की आवाज, ज्यादा इंसानी आवाजाही से वन्य प्राणियों के बसेरे उजड़ते है और वे घबराहट में शहरों में घूस जाते है। पिछले कुछ समय से इस तरह की घटनाएं बढ़ी है। इंसानों द्वारा बड़े पैमानें पर वन्य क्षेत्रों में विभिन्न गतिविधियां संचालित की जाती है जिस कारण वनों के विकास (विशेषकर पुर्नःउत्पादन) पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
अभी पिछले दिनों रेवास देवड़ा वन्य क्षेत्र में रामकथा का आयोजन किया गया जहां लगभग एक सप्ताह तक काफी आबादी का जमावड़ा रहा। जनप्रतिनिधि एवं प्रशासन जानता है कि वन्य क्षेत्र में इस तरह की गतिविधियां अनुचित है लेकिन किसी को नाराज नहीं करने के चक्कर में इन पहलुओं को अनदेखा किया जाता है। कुल मिलाकर इंसान जंगल में घुस रहा है एवं वन्य प्राणी जंगल छोड़कर बस्तियों में भोजन की तलाश में प्रवेश कर रहे है।
पिछले दिनों दिनांक 09.11.2025 को दैनिक समाचार पत्र में स्थानीय वनों के नुकसान की खबर मय फोटोग्राफ प्रसारित हुई थी। आश्चर्य का विषय है कि उक्त घटना पर जिला प्रशासन द्वारा कोई संज्ञान नहीं लिया गया है।जिला प्रशासन द्वारा जोरशोर से एक पेड़ माँ के नाम योजना चलाकर पौधरोपण किया जा रहा है। दूसरी तरफ बने बनाये जंगल उजड़ रहे है आखिर हम कहां जा रहे है।
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