मंदसौर जिलामल्हारगढ़

नुकसानी के मुआवजे की मांग को लेकर धरने पर बैठे किसान नेता ने ग्रामीणों के साथ की एसडीएम व तहसीलदार व अफीम अधिकारी से चर्चा

बेमौसम बारिश व ओलावृष्टि से रबी फसलों को भारी नुकसान, कई अफीम किसानों के सामने संकट, आजीविका पर संकट,

किशनगढ़ में किसानों का धरना प्रदर्शन, किसान नेता जोकचन्द ने की सरकार व नारकोटिक्स से तत्काल राहत व सहायता देने की मांग

पिपपिया स्टेशन (निप्र)। रविवार को मौसम में आए अचानक बदलाव ने किसानों की मेहनत पर पानी फेर दिया। तेज हवाओं के साथ हुई बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने खेतों में खड़ी रबी फसलों को व्यापक स्तर पर नुकसान पहुंचाया है। कुछ ही समय में मौसम का मिजाज पूरी तरह बदल गया और देखते ही देखते खेतों में लहलहाती फसलें जमीन पर गिर गईं। इस प्राकृतिक आपदा से किसान गहरे संकट में आ गए हैं। किसान नेता श्यामलाल जोकचन्द ने सोमवार को प्राकृतिक आपदा से प्रभावित मल्हारगढ विधानसभा क्षेत्र के गांव किशनगढ़, झारड़ा, लोढाखेड़ा, गोपालपुरा, अड़माल्या, हरमाला, पिपलिया विशनिया, बोरखेड़ी, पामाखेड़ा, चंदनपुरा आदि गांवों में नुकसानी का जायजा लिया। इस दौरान गांव किशनगढ़ में आक्रोशित किसानों ने किसान नेता जोकचन्द के साथ सड़क पर धरना-प्रदर्शन शुरु कर दिया। इस सूचना तहसीलदार ब्रजेश मालवीय मौके पहंुचे, उन्होंने प्रदर्शन कर रहे किसान नेता व ग्रामीणों ने आश्वस्त किया कि सात दिन के भीतर सभी नुकसान होने वाली फसलों का सर्वे कराया जाएगा। तहसीलदार ने कहा कि वे संबंध में नारकोटिक्स विभाग के अधिकारियों से भी चर्चा करेंगे। किसान नेता जोकचन्द ने इस मौके पर तहसीलदार की मौजूदगी में जिला अफीम अधिकारी से मोबाइल पर हेण्डफ्री कर किसानों के समक्ष चर्चा की व अफीम किसानों को राहत प्रदान करने की मांग की। जोकचन्द कहा कि 2 लाख रुपये प्रति हेक्टर के मान से सहायता दी जाए। साथ ही जिन किसानों के पास चीरा लगाने वाले 10 आरी का पट्टा है, अगर उसमें नुकसानी हुई है तो उसे अगले वर्ष भी 10 आरी का ही पट्टा दिया जाए और नुकसानी पर प्रति पट्टाधारक को 10 हजार रुपए आरी के मान से सहायता प्रदान की जाए। गांव लोढ़ाखेड़ा में पहंुचने के बाद किसान नेता जोकचन्द ने एसडीएम स्वाति तिवारी से भी बात की। जोकचन्द ने कहा कि मल्हारगढ विधानसभा के ही समूचे मन्दसौर-नीमच जिले के कई हिस्सों में यह प्राकृतिक कहर बनकर आई। किसानों के लिए अत्यंत दुखद और चिंताजनक है। अफीम, गेहूं, सरसों, चना, मसूर, मेथी, धनिया, अलसी, चिया सीड सहित लगभग सभी प्रमुख फसलों को भारी क्षति हुई है। कई खेतों में फसलें पूरी तरह नष्ट हो चुकी हैं, वहीं कई स्थानों पर उत्पादन में भारी गिरावट की आशंका है। उन्होंने बताया कि रबी की ये फसलें किसानों की वर्षभर की मेहनत, पूंजी निवेश और परिवार की आजीविका का मुख्य आधार होती हैं। खाद, बीज, कीटनाशक, सिंचाई और मजदूरी पर भारी खर्च करने के बाद जब फसल कटाई के लिए तैयार होती है, उसी समय इस तरह की आपदा आ जाना किसानों को मानसिक और आर्थिक रूप से तोड़ देता है। जोकचन्द ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि काफी महंगी व खास अफीम की फसल इस समय अत्यंत संवेदनशील अवस्था में थी। फूल और डोडे निकलने के दौरान ओलावृष्टि होने से डोडे टूट गए, पौधे क्षतिग्रस्त हो गए और कई खेतों में फसल पूरी तरह चौपट हो गई। अफीम एक नियंत्रित फसल है, जिसमें किसानों पर पहले से ही सरकारी नियमों, लाइसेंस और उत्पादन लक्ष्य का दबाव रहता है। ऐसे में इस नुकसान ने अफीम उत्पादक किसानों की कमर तोड़ दी है। उन्होंने कहा कि यदि खेतों में पानी का जमाव अधिक समय तक रहा, तो फसलों की जड़ें गलने का खतरा भी बना हुआ है, जिससे नुकसान और बढ़ सकता है। कई किसान पहले से ही कर्ज के बोझ तले दबे हैं और अब उनके सामने अगली बुआई की भी चिंता खड़ी हो गई है। किसान नेता ने सरकार से मांग की कि तत्काल प्रभाव से प्रभावित क्षेत्रों में राजस्व, कृषि एवं संबंधित विभागों की संयुक्त टीम गठित कर फसल नुकसान का सर्वे कराया जाए। सर्वे में वास्तविक नुकसान का ईमानदारी से आकलन किया जाए, ताकि किसानों को न्याय मिल सके। जोकचन्द ने आगे कहा कि नुकसान की गंभीरता को देखते हुए किसानों को पर्याप्त एवं त्वरित मुआवजा दिया जाना आवश्यक है। मुआवजा राशि प्रति एकड़ फसल के वास्तविक मूल्यांकन के आधार पर तय की जाए, जिससे किसान अगली फसल की तैयारी कर सकें और कर्ज के जाल से बाहर निकल सकें। जोकचन्द ने यह भी मांग की कि अफीम उत्पादक किसानों के लिए विशेष राहत पैकेज घोषित किया जाए। इसमें लाइसेंस शुल्क में राहत, उत्पादन लक्ष्य में समायोजन तथा अतिरिक्त मुआवजा शामिल किया जाए, क्योंकि अफीम की खेती पूरी तरह सरकारी नीति के अंतर्गत होती है और किसान इसमें स्वतंत्र निर्णय नहीं ले सकता। इसके साथ ही उन्होंने प्रभावित किसानों के फसली ऋण पर ब्याज माफी, बैंक व सहकारी संस्थाओं से लिए गए कर्ज की वसूली पर रोक तथा फसल बीमा दावों के त्वरित निपटारे की मांग भी की। उन्होंने कहा कि बीमा क्लेम की प्रक्रिया को सरल बनाया जाए, ताकि किसानों को कार्यालयों के चक्कर न काटने पड़ें। किसान नेता ने कहा कि यह घटना पूरी तरह प्राकृतिक आपदा की श्रेणी में आती है और इसमें किसानों की कोई गलती नहीं है। सरकार को संवेदनशीलता दिखाते हुए किसानों के साथ खड़ा होना चाहिए। समय पर राहत नहीं मिली, तो इसका सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसान परिवारों की सामाजिक स्थिति पर पड़ेगा। अंत में श्यामलाल जोकचन्द ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि शीघ्र सर्वे कर मुआवजे की घोषणा नहीं की गई, तो किसान अपने हक के लिए आंदोलन करने को मजबूर होंगे। सरकार को चाहिए कि वह राजनीतिक भेदभाव से ऊपर उठकर किसानों के हित में त्वरित और ठोस निर्णय ले।
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