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धार्मिक आयोजन से राष्ट्रवाद तक: आजादी की लड़ाई में कुंभ और माघ मेले की रही है ऐतिहासिक भूमिका- रविंद्र पाण्डेय

धार्मिक आयोजन से राष्ट्रवाद तक: आजादी की लड़ाई में कुंभ और माघ मेले की रही है ऐतिहासिक भूमिका
रविंद्र पाण्डेय

तीर्थराज प्रयाग में आयोजित माघ मेले की भूमिका देश की स्वतंत्रता में महत्वपूर्ण भूमिका रही भारत में अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी का कुशासन समाप्त करने में धार्मिक आयोजन के साथ-साथ राष्ट्रीय आंदोलन भी महत्वपूर्ण रहा इसलिए हिंदुत्व ही राष्ट्रीय है
1857 की क्रांति के दौरान और बाद में माघ/कुंभ मेले ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता संग्राम का मंच बन गया, जहाँ क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट होकर रणनीति बनाई, ब्रिटिश दमन का विरोध किया, और बाद में मदन मोहन मालवीय जैसे नेताओं ने यहीं से स्वतंत्रता आंदोलन को आगे बढ़ाया, जिससे यह ब्रिटिश शासन के अंत और भारत की आजादी की नींव रखने में सहायक बना।
भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन 1857 के विद्रोह के बाद भारत सरकार अधिनियम 1858 के तहत अगस्त 1858 में समाप्त हुआ, जिसके द्वारा कंपनी की सभी प्रशासनिक शक्तियाँ ब्रिटिश क्राउन (महारानी विक्टोरिया) को हस्तांतरित कर दी गईं और भारत का शासन सीधे ब्रिटिश ताज के अधीन आ गया, जिसके बाद कंपनी को 1874 में औपचारिक रूप से भंग कर दिया गया।
क्रांति से पहले
गुप्त बैठकें और संगठन: कुंभ मेले के विशाल जनसमूह ने क्रांतिकारियों को एक-दूसरे से मिलने और विद्रोह की योजना बनाने का अवसर दिया, जिससे यह ब्रिटिश खुफिया तंत्र से बचने का एक सुरक्षित स्थान बन गया।
ब्रिटिश दमन: अंग्रेजों ने कुंभ मेले के दौरान तीर्थयात्रियों (प्रयागवालों) पर क्रूरता दिखाई,तीर्थ यात्रियों पर भारी कर टैक्स लगाया जिससे उनमें असंतोष बढ़ा और उन्होंने मिशनरी गतिविधियों का विरोध किया।
आजादी की चिंगारी: 1857 के विद्रोह के बाद, इलाहाबाद (प्रयागराज) में 1858 के दरबार के बाद, कुंभ मेले के मैदान राष्ट्रवादी भावनाएं व्यक्त करने और ब्रिटिश ताज के शासन की घोषणा के गवाह बने, जिसने भारतीयों के मन में स्वतंत्रता की उम्मीद जगाई।
क्रांति के बाद:
राष्ट्रवाद का केंद्र: कुंभ मेला धार्मिक आयोजनों के साथ-साथ राष्ट्रवादी भावनाओं और विरोध प्रदर्शनों का केंद्र बन गया, जहाँ स्थानीय लोग और नेता बड़ी संख्या में इकट्ठा होते थे।
सांस्कृतिक प्रतिरोध: प्रयागवालों ने कुंभ मेले के माध्यम से अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाई और उनके नस्लीय उत्पीड़न का विरोध किया, जबकि ब्रिटिश मीडिया ने इन सभाओं को गलत तरीके से रिपोर्ट किया।
स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका: 1906 में, सनातन धर्म सभा ने प्रयाग कुंभ मेले में मिलना हुआ और मदन मोहन मालवीय जी के नेतृत्व में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) की स्थापना का संकल्प लिया, जो आजादी के आंदोलन का एक महत्वपूर्ण कदम था।
संक्षेप में, माघ/कुंभ मेला 1857 की क्रांति के दौरान और बाद में भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक आवश्यक मंच, एकजुटता का प्रतीक और राष्ट्रवादी चेतना के विकास का केंद्र साबित हुआ।
रविंद्र पाण्डेय

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