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भारत की सांस्कृतिक चेतना के उन्नयाक पं. दीनदयाल उपाध्याय-डॉ. भार्गव

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विश्व हिंदी परिषद द्वारा विज्ञान भवन नई दिल्ली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में डॉ. अशोक कुमार भार्गव द्वारा पं. दीनदयाल उपाध्याय: प्रकृति, संस्कृति एवं दर्शन विषय पर व्यक्त किए गए
भारतीय संस्कृति के सच्चे अग्रदूत पंडित दीनदयाल उपाध्याय का समग्र चिंतन भौतिकता की मायावी चमक के विपरीत वैश्विक कल्याण की विशुद्ध भारतीय परिकल्पना के सनातन प्रवाह का अमृत कलश है जिसकी आराधना का केंद्र समाज के अंतिम छोर पर खड़ा हुआ वह अंत्यज है जिसका समग्र उत्थान अपेक्षित है। यह मात्र कोरी कल्पना नहीं है वरन यूरोपीय पुनर्जागरण के अधूरे अपुष्ट मानववाद से भिन्न वर्ग संघर्ष और प्रतिस्पर्धा की खंडित दृष्टि को चुनौती देता हुआ भारतीय जीवन शैली के अनुरूप प्रगतिशील मानव समाज की रचना का एकात्म दर्शन है।
उक्त उदगार डॉ. अशोक कुमार भार्गव, पूर्व कमिश्नर रीवा एवं शहडोल संभाग ने विश्व हिंदी परिषद द्वारा विज्ञान भवन, नई दिल्ली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में पं. दीनदयाल उपाध्याय : प्रकृति,संस्कृति और दर्शन विषय पर विशिष्ट वक्ता के रूप में व्यक्त किये।
डॉ भार्गव ने कहा कि पंडितजी ने सिद्धांत की बलि चढ़ाकर मिलने वाली विजय को पराजय से भी ज्यादा बुरा मान और वे ऐसी विजय के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने राजनीति में सदैव वैचारिक निष्ठा और आचरण की शुचिता को महत्ता दी।
डॉ भार्गव ने कहा कि भारत ही वह महान सभ्यता है जहां एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षा करती हुई एक वनवासिनी से भेंट करने के लिए 14 वर्ष का वनवास स्वीकार करता है ताकि जब युगों का इतिहास लिखा जाए तो उसमें यह अंकित हो कि जब शासन प्रशासन अथवा राजसत्ता का प्रमुख पैदल चलकर वन में रहने वाले समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचता है तभी रामराज की परिकल्पना साकार होती है क्योंकि कोई भी व्यवस्था मनुष्य के कुशल क्षेम के बिना सफल नहीं हो सकती।
डॉ भार्गव ने विषय की विशद् विवेचना करते हुए कहा कि एकात्म मानववाद के उपासक पंडित जी मानते थे कि वट वृक्ष विशाल है। बीज सूक्ष्म है।वृक्ष अपनी संपूर्ण विशालता सहित बीज में समाया हुआ है।बीज की एकता ही पेड़ के तने, शाखाएं, पत्ते और फल के विविध रूपों में प्रकट होती है। सूक्ष्म ही विराट है विराट ही सूक्ष्म है। इसलिए सूक्ष्म और विराट में, व्यष्टि और समष्टि में तथा मनुष्य और समाज में संघर्ष नहीं है मूलभूत एकता का भाव है जो जीवन को टुकड़ों में नही समग्रता में देखता है।
डॉ भार्गव ने कहा कि हमारी संस्कृति समन्वय की संस्कृति है। प्रकृति के उपादानों के प्रति हमारी संस्कृति में प्रारंभ से ही अर्चना और आराधना के भाव रहे हैं किंतु पश्चिम प्रकृति को जड़ मानता है । वह प्रकृति के दोहन का पक्षधर है।यह विकृति का प्रतीक है। संसार में किसी से छीन कर खाना विकृति है, भूख लगना प्रकृति है और मिल बांटकर खाना संस्कृति है।
पंडित जी राष्ट्र निर्माण के मंदिर में महर्षि दधीचि की भांति अपने प्राणों का उत्सर्ग करने वाले वीतरागी साधक थे जो सत्ता के साकेत से दूर रहकर राष्ट्रीय चिंतन में विचारों की एकता, तथ्यों की एकता और मूल्यों की एकता पर बल देते थे। उनके लिए राष्ट्रीयता का आधार भारत माता है केवल भारत नहीं ।यदि माता शब्द हटा दीजिए तो भारत भूमि का एक टुकड़ा मात्र रह जाएगा।
डॉ भार्गव ने कहा कि आज समग्र संसार युद्ध की विभीषिका , भय ,असुरक्षा आतंक और प्राकृतिक प्रकोपों के घोर नैराश्य के अंधकार में डूबा हुआ है।ऐसी विषम स्थिति में पंडित जी का मानव केंद्रित मानव उत्कर्ष को समर्पित एकात्म दर्शन कल भी प्रासंगिक था आज भी प्रासंगिक है।
इस अवसर पर डॉ. अशोक कुमार भार्गव को पं. दीनदयाल उपाध्याय पर उनके उत्कृष्ट आलेख के लिए संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य इथियोपिया दूतावास के श्री गेब्रु टेकले विश्व हिंदी परिषद के राष्ट्रीय महासचिव डॉ.विपिन कुमार और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के संयोजक एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. रामनारायण पटेल ने सम्मानित किया। इस सम्मेलन में मुख्य अभ्यागत लद्दाख के उप राज्यपाल श्री कविंद्र गुप्ता, श्री के सी त्यागी, पूर्व राज्यसभा सदस्य एवं वरिष्ठ नेता (जद यू) सुश्री रेखा शर्मा राज्य सभा सांसद एवं पूर्व अध्यक्ष राष्ट्रीय महिला आयोग, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव श्री दुर्गा शंकर मिश्र,देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति, शिक्षाविद् अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान, चीन, सूरीनाम और इथियोपिया दूतावास प्रतिभागी सहित देश के अन्य विद्वतजन तथा शोधार्थी छात्र सम्मिलित थे।


