खेलमध्यप्रदेशरतलाम

जो ख़बर मिली है वो दिल रुला देने वाली है

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रामेश्वर नागदा।

पता चला कि कल विनेश का वेट जो 50 किलो कैटेगरी में मैच से पहले बिल्कुल exact फिट था, वो मैच जीतने के बाद कल रात ही बढ़ गया था। अब जीतने की ख़ुशी से ये वजन बढ़ा या किसी और वजह से, ये तो कोच बेहतर जानेंगे।

पर इतना ज़रूर है कि फाइनल मैच में कैसे लड़ना है, इससे ज़्यादा चिंता विनेश को अपने वजन को लेकर थी। उन्होंने रात जॉगिंग की, साइकलिंग की, अपने बाल काट दिए कि वजन कम हो जाये पर फिर भी सुबह 150 ग्राम ज़्यादा रहा। सर के बल खड़े होने के बाद भी सुबह 15 मिनट के वेट चेक टाइम में 100 ग्राम ज़्यादा निकला और विनेश को अयोग्य बता दिया गया।

ये जानकर विनेश बेहोश हो गईं, फिर उन्हें क्लीनिक ले जाया गया। एक ख़बर ये भी मिली कि विनेश ने अपना लहू निकालने की भी कोशिश की, फिर भी वजन अंडर नहीं हुआ। अगर ये सच है तो सोचिए, कितना क्रूर है ये!

एक ऐसा स्पोर्ट जिसमें फिजिकल फिटनेस ही सबकुछ है, उसमें भी ओलिम्पिक फाइनल से पहले खाना न खाना, पानी न पीना, चैन की नींद न लेना एक खिलाड़ी के लिए कितना बड़ा टॉर्चर रहा होगा, ये सोचकर ही रूह कांपती है।

वहीं ओलिम्पिक के नियमों की बात करें तो उनका क्लियर फंडा है, 2 दिन लगातार मैच होंगे तो दोनों दिन वेट चेक होगा। पहले दिन 30 मिनट तो दूसरे दिन 15 मिनट का टाइम मिलेगा। इस ड्यूरेशन में आप बार बार वेट चेक कर सकते हो! लेकिन वेट चेक मिस करने पर या जिस कैटेगरी में आप लड़ रहे हैं, उससे ज़्यादा वेट निकलने पर आपको डिस्क्वालिफाई कर शीर्ष से सीधे लास्ट में भेज दिया जायेगा। चाहें आपने 3 मैच जीते हों या तीस!

कौन सा खिलाड़ी किस कैलिबर का है और किस कैटेगरी में लड़ेगा, ये फ़ैसला तो कोच का होना चाहिए। ज़बरदस्ती किसी कैटेगरी में डालना सिर्फ और सिर्फ मैडल जीतने से ही नहीं रोकता बल्कि मनोबल भी तोड़ता है। ऐसी भी क्या ज़िद कि निचली कैटेगरी में ही लड़ना है, फिर चाहें जान पर आ बने!

ख़ैर, well Played champion, कोई बात नहीं, फिर सही। 100-200 ग्राम वजन से मैडल भले न मिले पर काबलियत थोड़ी कम हो जायेगी।

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