जैन तीर्थ परासली में 18 दिवसीय प्रतिष्ठा महोत्सव की शुरुवात साधु संतों के नगर प्रवेश के साथ हुई

जैन तीर्थ परासली में 18 दिवसीय प्रतिष्ठा महोत्सव की शुरुवात साधु संतों के नगर प्रवेश के साथ हुई
सुवासरा- नगर से 12 किमी दूर स्थित प्राचीन जैन तीर्थ परासली में 18 दिवसीय प्रतिष्ठा महोत्सव की शुरुवात साधु संतों के नगर प्रवेश के साथ हुई। 1500 वर्ष पूर्व प्राचीन आदिनाथ भगवान की प्रतिमा सहित अनेक जिंबिम्बो, प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा एवं अंजनशलाका कार्यक्रम होंगे। 18 दिवसीय प्रतिष्ठा महोत्सव की शुरुवात प्रतिष्ठा आचार्य बंधु बेलड़ी श्री जिन हेमचन्द्र सागर सूरिजी महाराज आदि विशाल श्रमणी परिवार के मंगल प्रवेश के साथ हुई। नगर प्रवेश जुलूस के दौरान 20 अजैन परिवारों ने चांवल की गहुली बनाकर गुरुदेव का आशीर्वाद लिया। वहीं 51बालिकाओ ने सर पर कलश धारण कर प्रवेश जुलूस की शोभा बड़ाई। प्रवेश जुलूस का नगर भ्रमण के बाद जैन तीर्थ परिसर में समापन हुआ। जहां आचार्य भगवंतों के मंगल प्रवचन हुए। आचार्य श्री आनंदचंद्र सागर सूरिजी महाराज ने प्रवचन के दौरान कहा कि परासली तीर्थ पवित्र , पवित्रतर से बढ़कर पवित्रम है। उन्होंने कहा कि इस तीर्थ से 57वर्ष पुराना संबंध है।
दोपहर में मंदिर में तीर्थ रक्षक यक्षराज श्री मणिभद्रजी हवन विधिकारक अनिल हरण के द्वारा करवाया गया।
शनिवार को प्रतिष्ठा महोत्सव के तीसरे दिन बंधु बेलड़ी आचार्य जिन हेमचन्द्र सागर सूरिजी महाराज की निश्रा में सुबह 6 बजे बीज मंत्र गर्भित श्री शांति धारा स्तोत्र के माध्यम से आदिनाथ भगवान का अखंड अभिषेक किया गया। इसके बाद सुबह 8 बजे सिध्दचक्र की आराधना स्वरूप 9 चैत्यवंदन की सामूहिक विधि हुई। 9 भक्ताम्बर स्त्रोत पाठ के द्वारा विशिष्ट मांत्रिक पुष्प पूजा आदिनाथ भगवान की हुई। सुबह 10 बजे पूज्य आचार्य श्री विरागचंद्र सागर सूरिजी ,आचार्य श्री पदमचंद सागर सूरिजी महाराज ने प्रवचन के दौरान ओलिजी तपस्या के महत्व को बताते हुए कहा कि नवपद की आराधना नींव के समान होती है। सिध्द भगवान का हमारे ऊपर सबसे बड़ा उपकार यह है कि अगर वे सिध्द नही बनते तो हम सभी अपना आत्म विकास नही कर पाते। जो सिद्ध बनने का लक्ष्य रखता है वह सर्वगुणों के राजा समान सम्यक दर्शन को प्राप्त कर लेता है। नव पद के आठ पदों का लक्ष्य अंतिम पद सिद्ध लक्ष्य की प्राप्ति ही है इसीलिए उसे सिद्ध चक्र कहते हैं। पूज्य आचार्य ने तप के महत्व को समझाते हुए आगे कहा कि शरीर को केंद्र में रखना वासना कहलाता है और आत्मा को केंद्र में रखना साधना कहलाता है।
परासली तीर्थ में शनिवार को पूज्य आचार्य भगवंतो की निश्रा में विभिन्न शहर और गांव से आए करीब 70 बालक बालिकाओं को उत्तम संस्कार प्रदान करने हेतु संस्कार उत्सव शिविर का आरंभ हुआ। प्रतिष्ठा महोत्सव में आए युवा मुनियों द्वारा अनेक विषयों पर सरल सुगम शिक्षा प्रदान की गई। 18 दिवसीय प्रतिष्ठा महोत्सव की शुरुआत में पूज्य आचार्याओं की मिश्रा में होली की तपस्या आयोजित होगी इसके बाद विभिन्न प्रकार की महापूजन एवं कार्यक्रम संपन्न होंगे