नीमचमध्यप्रदेश

अब घर बैठे सीसीटीवी कैमरे से हो रही अफीम फसल की निगरानी

घर से ही पशु पक्षी को भगा सकते, हर तरफ घूमता कैमरा

*नीमच*

डॉ बबलू चौधरी

।अफीम उत्पादक क्षेत्र होकर बड़े पैमाने पर बुवाई होती है। इन दिनों अफीम की खेती यौवन पर है तथा सफेद फूल से डोडा बनने की प्रक्रिया में है। शीघ्र इन पर चीरा लगाने का कार्य शुरू होगा। अफीम की फसल को अपने बच्चों की तरह पालने वाले किसान रात दिन सुरक्षा को लेकर चिंतित है।

हालात यह है कि किसान अपने सारे जरूरी काम छोड़ कर खेतों की सुरक्षा में लगे हुए हैं। अंधेरी रात भी आंखों में निकल जाती है। अफीम की फसल से डोडे चोरी व नुकसान की आशंका में किसान दिन रात खेतों पर डेरा डाले हुए हैं। इतना ही नहीं अफीम की सुरक्षा के लिए किसानों ने हाईटेक व्यवस्था करते हुए सीसीटीवी कैमरे तक लगाए हैं।

इमरजेंसी जैसे मामलों में भी किसान अपने अफीम के खेत को नहीं छोड़ पाते हैं। किसान स्वयं या उनके परिवार के सदस्य खेत पर रहते हैं। इन दोनों विवाह का सीजन भी चल रहा है तो किसानों को खेत पर ही रहना पड़ता है।

आगामी दिनों में अफीम की लुगाई एवं चिराई का काम शुरू होगा लेकिन जब तक यह कार्य पूरा नहीं हो जाता किसानों के लिए कठिन परीक्षा की घड़ी निकलने वाली है। काले सोने के रूप में शुमार अफीम की फसल की सुरक्षा करना किसानों के लिए भारी पड़ रहा है। फसल को मौसम से बचाना काफी मुश्किल हो रहा है। पशु पक्षियों से बचाने में दिन रात लगे हुए हैं।

अफीम के डोडो को तोते तथा नीलगाय सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते है। इससे बचने के लिए किसान अब जाल लगाने लगाने लगे हैं। इधर, जिले के खेतों में डोडे पकने की कगार पर है। फरवरी के बाद मौसम अनुकूल रहा तो डोडे के चीरे लगाने का क्रम शुरू हो जाएगा।

इन दिनों फसल अपनी पूरी अवस्था में चल रही है। अब किसानों ने खेतों पर डेरा डाल दिया है। अफीम की फसल बढ़ने के साथ ही किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें भी बढ़ रही है। किसान परिवारों को फसल की सुरक्षा में दिन-रात खेतों में ही गुजारा करना पड़ रहा है। किसान अपनी फसल को प्राकृतिक प्रकोप, मवेशियों और पक्षियों से सुरक्षा करने तथा अफीम तस्करों से भी बचाने में जुटे हैं। अफीम काश्तकार ने बताया कि अफीम को काली देवी के रूप में पूजने की मान्यता है। इसे काला सोना भी कहा जाता है।

‘काले सोने’ की सुरक्षा में दिन-रात चौकस रहते हैं किसान, तैयारियों में क्या-क्या?

इमरजेंसी जैसे मामलों में भी किसान अपने अफीम के खेत को नहीं छोड़ पाते हैं। किसान स्वयं या उनके परिवार के सदस्य खेत पर रहते हैं। इन दिनों विवाह का सीजन भी चल रहा है तो किसानों को खेत पर ही रहना पड़ता है।

आगामी दिनों में अफीम की लुवाई एवं चिराई का काम शुरू होगा लेकिन जब तक यह कार्य पूरा नहीं हो जाता किसानों के लिए कठिन परीक्षा की घड़ी निकलने वाली है। काले सोने के रूप में शुमार अफीम की फसल की सुरक्षा करना किसानों के लिए भारी पड़ रहा है। फसल को मौसम से बचाना काफी मुश्किल हो रहा है। पशु पक्षियों से बचाने में दिन रात लगे हुए हैं।

अफीम के डोडो को तोते तथा नीलगाय सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते है। इससे बचने के लिए किसान अब जाल लगाने लगाने लगे हैं। इधर, जिले के खेतों में डोडे पकने की कगार पर हैं।

इन दिनों फसल अपनी पूरी अवस्था में चल रही है। अब किसानों ने खेतों पर डेरा डाल दिया है। अफीम की फसल बढ़ने के साथ ही किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें भी बढ़ रही है। किसान परिवारों को फसल की सुरक्षा में दिन-रात खेतों में ही गुजारा करना पड़ रहा है। किसान अपनी फसल को प्राकृतिक प्रकोप, मवेशियों और पक्षियों से सुरक्षा करने तथा अफीम तस्करों से भी बचाने में जुटे हैं।

वर्तमान समय में सुखवाड़ा क्षेत्र के किसान सुरक्षा के लिए कई किसानों ने खेतों पर झोपड़ियां बना ली है। इसमें रह कर किसान दिन-रात रखवाली कर रहे हैं। अफीम की फसल पर फूल और डोडे आते ही मवेशियों और प्राकृतिक प्रकोप से भी खतरा कम नहीं होता है। किसानों ने मवेशियों से फसल की सुरक्षा के लिए तारबंदी कर लोहे की जालियां लगा दी है।

प्राकृतिक आपदा से बचने के लिए भी जतन
किसान बालमुकुंद , मोहन लाल राठौर ने बताया कि प्राकृतिक प्रकोप से बचाव के लिए अफीम की फसल के चारों तरफ मक्का की बुवाई करते हैं। इससे शीत लहर और पाले से अफीम को नुकसान नहीं पहुंचता है। कई किसानों ने नील गायों से बचने के लिए खेत के चारों और 1 दर्जन से अधिक साड़ियां लगा रखी है।

खेत पर ही चल रहा किसानों का चूल्हा
इधर, जानकारी में सामने आया कि अफीम की खेती में किसान का पूरा परिवार लगता है। करीब 2 महीने तक किसानों का पूरा परिवार खेत पर ही रहता है। यहां तक चूल्हा भी खेत पर ही जलता है। परिवार के सभी सदस्यों का का खाना खेत पर ही बन रहा है।

बीमारी हो या विवाह, खेत पर ही निकलता समय
इमरजेंसी जैसे मामलों में भी किसान अपने अफीम के खेत को नहीं छोड़ पाते हैं। किसान स्वयं या उनके परिवार के सदस्य खेत पर रहते हैं। इन दोनों विवाह का सीजन भी चल रहा है तो किसानों को खेत पर ही रहना पड़ता है।

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