आलेख/ विचार

किसानो के दर्द को समझे जिम्मेदार, घोड़ारोज की समस्या के समाधान के लिये कड़े कदम उठाये

किसानो के दर्द को समझे जिम्मेदार, घोड़ारोज की समस्या के समाधान के लिये कड़े कदम उठाये
– सामाजिक कार्यकर्ता गौरव सोनी
मंदसौर, मध्यप्रदेश
मो.नं. 9893248902
शासन प्रशासन का किसानों की समस्या की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए मांग की है कि घोड़ारोज जो किसानों की खड़ी फसल को बर्बाद कर रहे है उन पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई जाये।
श्री सोनी ने कहा कि राज्य वन अनुसंधान जबलपुर ने वर्ष 2018 में मंदसौर जिले में घोड़ारोज की गणना की थी। इसके आंकड़े वर्ष 2021 में घोषित किए गए थे। इस गणना के मान से जिले में लगभग 25 हजार घोड़ारोज पाए गए ऐसी जानकारी निकाली गई थी। वास्तविकता में यदि देखा जाए तो वर्तमान समय में इन घोड़ारोज की संख्या आंकड़ों से बहुत अधिक हे और इसके कारण किसान परेशान हे। इसको कई लोग नीलगाय के नाम से भी जानते हे इसका यह अर्थ नही हे कि यह गाय की कोई प्रजाति हे। यह एक जंगली जानवर है जिसे सामान्य  भाषा में घोड़ारोज या रोजडे कहा जाता हे। अपना परिवार चलाने के लिए जो पूरे देश के परिवार का पेट भरते हे ऐसे किसान अन्नदाता के साथ ही देश के भाग्यविधाता भी हे क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहां की अर्थव्यवस्था भी पूरी तरह से कृषि आधारित ही हे। यदि फसल अच्छी हुई और किसानो को फसलो के दाम भी अच्छे मिले तो अर्थव्यवस्था भी पटरी पर दौड़ने लगती हे बाजार में रौनक आ जाती हे। परिश्रम की पराकाष्ठा को पार कर अन्न उपजाने वाले हमारे किसान भाईयों का दर्द हमको समझना होगा। इन जंगली जानवरो से अपनी फसल को बचाना किसानो के लिए वर्तमान समय में बहुत बड़ी चुनौती बन गई हे। यह जंगली जानवर खेतो में प्रवेश कर फसल को बर्बाद न करे इसके लिए किसान कई प्रकार के उपाय भी करते हे किंतु फिर भी समस्या का समाधान न निकलते हुए आर्थिक नुकसान दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा हे। रात हो या दिन दोनो समय यह फसलो को  रौंद रहे हे और खराब कर रहे हे। करोड़ो रूपये की फसल की बर्बादी हो रही हे। किसान ऐसी कड़ाके की सर्दी में भी अपनी जान जोखिम में डालकर भी रातभर जागकर अपनी फसलो की सुरक्षा करने को मजबूर हे। कई बार यह जंगली जानवर हिंसक होकर हमला भी कर देते हे और इनके द्वारा सड़क हादसे भी निरंतर होते रहते हे अभी तक ऐसे सड़क हादसो में कई लोग गंभीर घायल भी हुए हे और कई तो अपनी जान भी गंवा चुके हे। मनुष्य के जान की कीमत भी शायद जो इसके लिए जिम्मेदार तंत्र हे उसके लिए नही हे। करोड़ो रूपये की फसल बर्बाद हो रही हे तो यह केवल किसान का व्यक्तिगत नुकसान ही नही हे इससे देश की अर्थव्यवस्था को भी हानि हो रही हे। एयर कंडीशनर कमरो में बैठने वाले जनप्रतिनिधि और अधिकारी ऐसी हाड़ कंपा देने वाली सर्दी मे यदि रात के समय किसी खेत पर पांच मिनिट भी जाकर खड़े हो जायेंगे तो किसानो के परिश्रम का सही मूल्यांकन मानवीय संवेदनाओं के साथ कर पाएंगे और उनका दर्द इन जिम्मेदारों को समझ में आ जाएगा। दुख केवल इस बात का हे कि राजनीति के केंद्र में रखने वाले किसान को केवल वोटबैंक के रूप में ही सभी राजनीतिक पार्टियां उपयोग कर रही हे। परिश्रम करते किसान को यह भी पता नही होता कि उसके द्वारा फसल उपजाने में लगाई गई लागत का मूल्य भी उसे मिलेगा के नही क्योंकि प्रकृति की मार का भी उसको सामना करना पड़ता हे। कभी अतिवृष्टि तो कभी अल्पवृष्टि का भी उसे सामना करना पड़ता हे। कई बार मुंह में आया निवाला भी मौसम की मार के कारण छीन लिया जाता हे। जब तक फसल पककर खेतो से किसान के घर पर नही आ जाए तब तक अनिश्चितता की स्थिति रहती हे और उसकी चिंता बनी रहती हे। यदि सरका र में बैठे जिम्मेदार जनप्रतिनिधि व अधिकारी इस समस्या का समाधान नही कर पा रहे या फिर उनको यह समस्या ही नही लग रही ऐसा भी माना जा सकता है तो फिर किसानो को इसके लिए इतने अधिकार व स्वतंत्रता दी जानी चाहिए कि वह अपने जीवन एवं फसल की रक्षा के लिए जो उचित लगे वह करे इसके लिए इन जंगली जानवरो को मारना भी पड़े तो फिर वह भी सही

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