राजा टोडरमल और पोरवाल समाज

———————–
जांगड़ा पोरवाल समाज का इतिहास
जांगड़ा पोरवाल समाज जाति के परिवार वर्तमान समय में राजस्थान क्षेत्र के कुछ शहरों जैसे भवानीमंडी, रामगंजमंडी, कोटा, बूंदी, बेगूं , झालरापाटन , छतरपुर, चौमहला आदि, मालवांचल और आमद आदि प्रदेशों के रामपुरा, भानपुरा, गरोठ, शामगढ़, सुवासरा, जावरा, नागदा, खाचरोद, महिदपुर, आलोट, रतलाम बदनावर मंदसौर, उज्जैन, भोपाल, आष्टा, झाबुआ, देवास, इंदौर, अहमदाबाद, नीमच मनासा ,रतलाम आदि एवं इनके निकटवर्ती ग्रामों में बहुत बड़ी संख्या में निवास करते हैं।
आज इनकी संख्या लाखों में है और परिवार हजारों में है । इन परिवारों में आज भी 90% जाति बन्धु वैष्णव धर्म की उपासना करते हैं शेष 10% जैन धर्म के अनुयाई बन चुके हैं।
वैष्णव धर्मी महाजन वैश्य वर्ण पोरवाल समाज में स्वाभिमान कूद कर भरा है। यह मालवांचल के छोटे-छोटे गांव में, चंबल नदी के किनारे लंबे समय से शांत प्रिय अपना जीवन यापन कर व्यवसाय कर रहे हैं। यह अन्य पोरवाल नामधारी जातियां को अपना समक्ष नहीं मानते हैं। साथ ही किसी भी अन्य पोरवाल समाज के घटकों में अपना बेटी संबंध भी स्वीकार नहीं करते हैं। यह पोरवाल समाज परिवार अन्य नामधारी पोरवाल समाज घटकों से केवल रोटी संबंध ही सीमित रखते हैं। इस जाति का इतिहास लंबे समय से मालवांचल में बिखरा पड़ा है ।कई बावड़िया, प्राचीन मंदिर, शिलालेख, कुलभेरव और सतीमाताजी के स्थान पर लगे प्राचीनतम पत्थरों शिलालेखों से इस क्षेत्र में निवास करने का ऐतिहासिक समय ज्ञात होता है। किंतु अभी भी यह शोध का विषय है कि जांगड़ा पोरवाल समाज, मालवांचल में कब आकर बसा। इस विषय में मंदसौर की शोधार्थी जगदीश काला द्वारा लंबे समय से गोत्र भैरूजी एवं सतीमाता, पूर्वजों के प्राचीन स्थान, बावड़ियों, मंदिर के शिलालेखों का वाचन करने का प्रयास किया जा रहा है। और इससे संबंधित ऐतिहासिक प्रमाण एकत्र किए जा रहे हैं।
मालवांचल में पोरवाल समाज के चार भाट या राव परिवार जो वंशावलियां लिखते थे, उनसे भी कुछ जानकारी प्राप्त होती है। पोरवाल समाज के रूणिजा, रामपुरा, चन्दवासा और खड़ावदा में पोरवाल समाज के भाट परिवार रहते थे। समाज में कई महापुरुष हुए हैं । शादी कई सशक्त महिला शक्ति भी अपना लोहा मनवा चुकी है।
आज समाज में वर्तमान में जगह-जगह पूजित राजा टोडरमल का नाम सर्वाधिक चर्चा में है। जिनके विषय में जांगड़ा पूर्वज समाज जाग जाग मूर्ति स्थापित कर चौराहों का नामकरण कर उन्हें अपना महापुरुष मानता है । राजा टोडरमल के विषय में समाज के कुछ वर्गों में मतभेद भी पैदा होने लगा है। पोरवाल समाज के नामधारी अन्य घटक जो बाद में दिल्ली से आए होंगे उनकी रक्षा राजा टोडरमल ने बादशाह से की होगी।राजा टोडरमल के बारे में बहुत ज्यादा लिखित प्रमाण अभी तक उपलब्ध नहीं हो सका है। इसके विषय में मंदसौर के मालवांचल के शोधार्थी के रूप में मैं जगदीश काला लगातार शोध कार्य कर रहा हूं।
राजा टोडरमल के सम्बन्ध में ऐसी एक भाटपौथी पुस्तक खाचरोद के आसपास बद्रीलाल जी पोरवाल अजेला वाले के पास उपलब्ध है और मैंने स्वयं (जगदीश काला मन्दसौर) उनसे चर्चा कर ऐतिहासिक जानकारी प्राप्त की, उनके परिवारों में आज भी देवता के कण्ड्यो में पूर्वज राजा टोडरमल और सतीमाताजी के स्थान पर टोडरमल की अविवाहित पत्नी रूपवती को पूजा जाता है। उनकी पौथी से राजा टोडलमल जी के विषय में एक विशेष जानकारी ज्ञात होती है जो इस प्रकार हैं
विक्रम की 12 वीं शताब्दी के प्रथम चरण में पोरवाल जाति के कुछ घटक अयोध्या जाकर बसे और कुछ घटक चर्मण्वती नदी के किनारे आकर बसे। बहुत समय तक वहां निवास किया।
उसके पश्चात वहां से रोजगार की तलाश में दिल्ली के आसपास के प्रसिद्ध नगरों में आकर बसे उस समय दिल्ली में बादशाह का राज्य था एक दिन बादशाह ने इस जाति की अति सुन्दर रूपवती कन्या को देखा, वह उसे पर परम मोहित हो गया और उसे कन्या के पिता से जो दिल्ली के बड़े सेठ थे देखकर उस कन्या की इच्छा जाहिर की।
राज दरबार से लौटकर बादशाह ने तत्काल ही यह संदेश भिजवाया कि इस परिवार की कन्या को शीघ्र ही राजमहल में भेजा जाए। यह संदेश प्राप्त होते ही पोरवाल समाज के श्रेष्टी व्यक्तियों को एकत्र कर एक बैठक आयोजित की गई जिसमें बादशाह के फरमान से सबको अवगत कराया गया। सर्वानुमति से निर्णय लिया गया कि यह विषय अति गंभीर है। इस पर किसी भी विशिष्ट पुरुष या पोरवाल श्रेष्टी की सहमति लेकर ही आगे की ओर कदम उठाना चाहिए। इस विषय पर सहमति प्राप्त करने के लिए विद्वान मंत्री टोडरमल को चुना। वे सभी लोग तत्काल श्री टोडरमल के समीप गए और उन्हें अपने आने का सारा कारण विस्तार से कह सुनाया और इस संकट से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की।
दिल्ली बादशाह के आदेश पर सब पोरवाल परिवारों में चिंता की लहर दौड़ गई। इन्होंने सोचा कि बादशाह के सम्मुख इस विषय पर कुछ समय मांगने के लिए हम जिसका भी नाम प्रस्तुत करेंगे, बादशाह कुछ ना कुछ कारण बताकर टाल देंगे। अतः बादशाह के सम्मुख ऐसा नाम प्रस्तुत किया जाए जिससे की बादशाह अस्वीकार नहीं कर सके। इस विषय को लेकर बहुत कुछ विचार विमर्श हुआ। और अंत में यह निर्णय लिया गया कि इस कार्य हेतु विद्वान मंत्री टोडरमल को जमानत के लिए तैयार किया जाए। सभी पोरवाल लोग मंत्री टोडरमल के समीप पहुंचे और बादशाह से हुई सारी बातचीत और बादशाह की शर्त उन्हें कर सुनाई ।साथ ही यह भी निवेदन किया कि इस समय यदि कोई हमारी संकट में सहायता कर सकता है तो वह आप ही है। अतः कृपा कर आप बादशाह के समक्ष हमारे जामीन होकर हमारा यह तात्कालिक संकट दूर कर दीजिए। फिर एक माह की अवधि में आपकी इच्छा अनुसार इस संकट का कुछ न कुछ समाधान निकाल ही लेंगे । मंत्री टोडरमल ने इन परिवारों की संकट में मदद करते हुए बादशाह के समक्ष जमानत देना स्वीकार किया। बादशाह के समक्ष टोडरमल इन पोरवाल परिवारों के जमानतदार बनकर तात्कालिक संकट से बाहर निकाला।
विद्वान मंत्री और वैश्य शिरोमणि टोडरमल के इस विषय में बीच में आ जाने से पोरवाल परिवारों को एक माह की अवधि मिल गई। किंतु बादशाह अंदर ही अंदर टोडरमल से बहुत ही रूष्ट हुआ और टोडरमल से बोला कि यदि इन परिवारों ने एक माह की अवधि में अपना वचन पूरा नहीं किया, अपनी कन्या का डोला नहीं भेजा तो तुम्हें इसी दरबार में मृत्यु दंड दिया जाएगा। टोडरमल ने बादशाह किए शर्त स्वीकार कर ली और सब अपने घर की ओर चले गए।
इधर जब इन पोरवाल परिवारों ने देखा की बादशाह और मंत्री टोडरमल दोनों ही इस समय युद्ध लड़ने के लिए दिल्ली से बाहर गए हुए हैं, तो उन्होंने अवसर को जाने नहीं दिया और यह अपने धन बल और परिवार को लेकर धीरे-धीरे उसे क्षेत्र से पलायन कर गए और राजस्थान के आसपास क्षेत्रों में आकर बस गए। उधर बादशाह टोडरमल सहित जब युद्ध भूमि से राजधानी को लौटे । युद्ध से आने के कुछ दिन बाद मंत्री टोडरमल का विवाह होना निश्चित हो गया और टोडरमल के लगन लिखा गए ।मंत्री टोडरमल दूल्हा बना। टोडरमल के घर विवाह की शहनाईया गूंज रही थी। इतने में बादशाह को टोडरमल की जमानत याद आई। बादशाह को जैसे ही टोडरमल की विवाह की पत्रिका सूचना मिली, इस विवाह की सूचना पाते ही बादशाह ने तत्काल टोडरमल को राज दरबार में बुलवाया, और उसे शर्त का स्मरण कराया।
टोडरमल ने अपनी जमानत अनुसार उन पोरवाल परिवारों से बातचीत करने के लिए दो दिन का समय मांगा। जांच करने हेतु मंत्री टोडरमल उन परिवारों के क्षेत्र में गए। मंत्री टोडरमल ने उस अल्प अवधि में ही उन परिवारों की तलाश करवाई किंतु क्षेत्र में उन परिवारों का एक व्यक्ति भी नहीं मिला। खाली हाथ मंत्री टोडरमल जब राज दरबार लोटा और बादशाह को सारी बात कह सुनाई तो बादशाह बहुत रुष्ट हुए । उसे रंग में भंग टोडरमल के बीच में आ जाने से हुआ था।
अतः बादशाह ने मंत्री टोडरमल पर क्रोध करते हुए टोडरमल को तत्काल केदकर प्राण दंड देने का आदेश सुनाया। अगले ही दिन टोडरमल को प्राण दंड दे दिया गया। टोडरमल की मृत्यु की सूचना जैसे ही उसकी अविवाहित पत्नी को हुई और अविवाहिता पत्नी भी दिल्ली आकर टोडरमल के साथ सती हुई ।
मंत्री टोडरमल ने समाज की रक्षा करने में अपने प्राण न्यौछावर किये, इसी कारण टोडरमल राजा कहलाए और समाज के महापुरुष भी ।
तब से लोगों में एक कहावत शुरू हुई,,,, बड़े बुजुर्ग आज भी कहते हैं,,,
“मुफत में मारा गया टोडरमल”
कोटि कोटि नमन,,,
जय राजा टोडरमल,,,
शोध जारी है,,,,
✍️ जगदीश काला मन्दसौर
शोधार्थी-मालवांचल में पोरवाल समाज का इतिहास