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किसके सिर बंधेगा जीत का शेरा निर्दलीय बन सकते है मुसीबत,,,,?
क्या इस बार प्रदेश में नाथ का कमल होगा या कमल का कमल कायम रहेगा,,,,,,?
परिणाम को लेकर बैचैन प्रत्याशी को 73 घंटे पड़ रहे भारी।
✍️ राजेन्द्र देवड़ा
आलोट। जैसे जैसे मतगणना का समय नजदीक आ रहा वैसे वैसे भाजपा कांग्रेस और निर्दलीय प्रत्याशियों की नींद हराम हो रही है। कांग्रेस भाजपा और निर्दलीय अपनी जीत का गणित ज्ञान लगाकर अपनी पक्की जीत मान रहे है। निर्दलीय उम्मीदवार प्रेमचन्द गुड्डू के आसपास जो हमेशा मंडराते वह हर बार हम 60 हजार वोट से जीतेंगे यह कहकर उम्मीदवार को चने के झाड पर चढ़कर गुमराह करते रहे है।
मतदान के बाद जीत हार पर लगने लगे दांव, चौक चौराहों पर चुनाव की चर्चा जारी चेहरों पर खुशी दिल में बेचैनी आलोट जावरा को लेकर भाजपा नेता फुल काॅन्फिडेंट में और कांग्रेस निर्दलीयो को लेकर आलोट जावरा में असमंजस में 3 दिसंबर को एवीएम खोलेगी मतदान परिणाम का पिटारा जनता के मौन वोट तय करेंगे अपना और नेताओ का भविष्य।
विधानसभा चुनाव खत्म हो गया है लेकिन चुनाव को लेकर चर्चाओ का दौर जारी है चुनाव के बाद क्षेत्र में सटोरिए भी सक्रिय हो गए है। चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार एव॔ राजनीतिक पार्टी अपने अपने समर्थको से क्षैत्रवार मतदान व वोटों के आकडो को जुटाने में लग गए है।
होटल पान दुकान सार्वजनिक चौक चौराहो पर चाय की टापरियों में अब पार्टियों के कार्यकर्ताओ के साथ चुनाव में दिलचस्पी रखने वाले लोग भी अपने आकडे बताकर जीत का दावा प्रतिदावा कर रहे है। जीत हार के दावो के बीच अब कई शर्ते लगने लगाने की चुनौती दे रहे है। जो अपने फायदे या सरकार की योजनाओ का लाभ मिलने या फिर कही किसी बड़े नेता के भाषण से प्रभावित होकर किसी भी पार्टी को मतदान करते है।लेकिन कुछ लोग अजीब गरीब के होते उन्है न किसी सरकार की योजनाओ से मतलब हे ना भष्टाचार से मतलब है न किसी चेहरे से मतलब है बस पारिवारिक परंपरा का निर्वाह करते हुए किसी भी एक दल का समर्थन करते आए है, यह उस दल के खिलाफ कोई टीका टिप्पणी या आरोप तक सुनना पसंद करते है। कांग्रेस के समर्थक जीत के आकडे गिना रहे है तो दूसरी ओर भाजपा के समर्थक प्रदेश सरकार और केन्द्र सरकार की योजनाओ के बल पर जीत के लिए आश्वस्त है। वही निर्दलीय उम्मीदवार के समर्थक अपने उम्मीदवार की जीत एक तरफा पक्की मान रहे है।
आलोट- जावरा विधानसभा में सर्वाधिक कयास लगाये जा रहे है। क्योकि यहा दोनो जगह पर निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे है। हालांकि मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच होना था परन्तु निर्दलीयो उम्मीदवारो ने खेल बिगाड दिया है। बढ़ते मतदान को भाजपा बता रही आरएसएस की मेहनत है, बढे प्रतिशत के मायने तलाश रहे नेता परन्तु यह मत प्रतिशत प्रशासन की मशक्कत से बढा व वोटिंग प्रतिशत भी। कांग्रेस को पहली बार मेनेजमेंट पर भरोसा है। होईये वही जो राम राखे उसे कोन चाखे जो राम करेगे, यानी होगा वही जो भगवान राम जी ने पहले से रच रखा है उसे कोन रोक सकता है। रामायण की ये चौपाई इन दिनो प्रदेश में चरितार्थ हो रही है कारण है परिणाम जो इस बार लम्बे खिंचा गए है। वोट डालने और परिणाम पाने में 16 दिनो का प्रदेशवासियों के बीच फासला रहा है। अब 73 घंटो का लम्बा फासला खींच रहा है। इस बीच में दोनो प्रमुख दल ही नही निर्दलीय उम्मीदवार और आमजन भी असमंजस में है कि सत्ता में कौन आ रहा है। क्या कांग्रेस विश्वाघात का बदला ले पाएगी या भाजपा की सत्ता अक्षुण्ण रहेगी,,,,?
पहली बार सबसे ज्यादा हुआ मतदान इन दोनो प्रमुख दलो को भी डरा रहा है। कोई भी डके की चोट आश्वस्त नही। भाजपा मोदी सनातन और लाड़ली बहना योजनाओ के बल पर सत्ता में लौटने का दांव कर रही है।
कांग्रेस नेता फिर वही दौहरा रहे है हमारा चुनाव जनता ने लड़ा है,,,,।
परिणाम को लेकर बैचैन प्रत्याशी का एक एक दिन का इंतजार पड़ रहा भारी
मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव का मतदान 17 नवंम्बर को संपन्न हो चूका है मतदाताओ ने इस बार वोटिंग का रिकॉर्ड तोड़ दिया। इस बार अभी तक का सर्वाधिक 83,29% प्रतिशत मतदान हुआ है। महिलाओ ने भी इस बार सर्वाधिक मतदान कर रिर्काड बनाया । लेकिन इस बार चुनाव में खड़े हुए प्रत्याशियों को नतीजों के लिए 16 दिनों का लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। यह पिछ्ले पांच चुनावों में सर्वाधिक लंबी प्रतीक्षा है।इस वजह से प्रत्याशियों में नतीजों के प्रति बेचैनी बढ़ती जा रही है। पिछले चुनावों में नतीजों के लिए इंतजार को देखें तो वर्ष 1998 और 2003 में मतदान संपन्न होने के तीसरे दिन चुनाव परिणाम घोषित हो गए थे, वही 2008 में 11 दिनों तक इंतजार करना पड़ा था। इसके बाद 2013 और 2018 में 13 दिनों का इंतजार करना पड़ा था। लेकिन इस वर्ष यानी 2023 में तो 16 दिनों के इंतजार के बाद चुनाव परिणाम जानने को मिलेगे। दरअसल चुनाव आयोग ने मध्य प्रदेश के अलावा चार राज्यो में विधानसभा चुनाव साथ-साथ कराए थे इसलिए उसे सुरक्षा बलों की तैनाती और शान्तिपूर्ण चुनाव करवाने के सभी इंतजाम करना होते है। सभी उम्मीदवार प्रचार की भागदौड और थकावट से पूर्ण मुक्त होकर अब परिणामों का इंतजार कर रहे है, उनकी धड़कने भी बढ रही है। तीन दिसंबर को उनकी किस्मत का फैसला हो जाएगा।
अब ये फैसला 73 घंटो के बाद हो जाएगा कि प्रदेश के नाथ का कमल होगा या कमल का कमल कायम रहेगा,,,,,?
सत्ता का सफर और लाड़ली बहना की सवारी,,,,! शेष 73 घंटो में फैसला।
मैदाने- ए- जंग में किसी एक की जीत तो किसी की हार होती है तो 3 दिसंबर को यही परिपाटी निभने वाली है अभी मतगणना में 73 घंटे शेष है और कयास बाजी जमकर चल रही है। इस बीच भाजपा और कांग्रेस ने बड़े बड़े दावे ठोकने शुरू कर दिए है, अपनी- अपनी विजय के सन्दर्भ में भाजपा तो लाड़ली बहनाओ के जरिये सत्ता में बने रहने को लेकर आश्वस्त हो चुकी है, तो कांग्रेस एंटी इंकम्बेंसी की दुहाई देकर सरकार बनाने के सपने देखने लगी है। बहरहाल मुद्दा ये है कि क्या जनादेश इन्ही दावों और प्रति दावों के मध्य सिमट जाएगा या फिर आवाम द्वारा सत्ता के सूत्र सौंपने की पांच साल की कवायद कुछ अलग संदेशा लेकर आने वाली है,,,,? 17 नवम्बर को हुए वोटिंग पर बहस यही से छेड़ दी गई शहरी और ग्रामीण मतदाताओ के मत प्रतिशत के कई किस्से सामने लाए गए अनुसूचित जाति- अनुसूचित जनजाति बहुल विधानसभा क्षेत्रो के वोटिंग पैटर्न के चर्चे उछाल दिए गए मुस्लिम मतदाताओ के निर्णायक मतदान वाली सीटों को लेकर भी उदाहरण गिनाए जाने लगें उच्च और दबंग नेताओ द्वारा किये गए और करवाये गए मतदान को लेकर भी गुणा भाग पेश किए जाने लगें।
मतदान के बाद चुनावी सवाल जवाब का सिलसिलेवार उसकी गिनती दहाई के अंक के पार पहुंचा दी गई सस्ती रसोई गैस आयुष्मान कार्ड किसानो के खाते में हर माह एक हजार रुपए का बोनस शादी- शुदा यानी लाड़ली बहनो के बैंक अकाउंट में बढ़ते क्रम में लगातार एक हजार से बारह सौ पंचास रुपए केडिट करने जैसी बातों का खूब ढिंढोरा पीटा गया।