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15 जून यौमें पैदाईश (जन्मदिवस विशेष)-संगीतकार सज्जाद हुसैन

15 जून 1917 यौमें पैदाईश (जन्मदिवस विशेष)-संगीतकार सज्जाद हुसैन

 

छोटी काशी सीतामऊ “मालवा”जिनकी जन्मस्थली

अरबी शैली के संगीत के टुकड़ों से अपनी धुनें सजाने में माहिर सज्जाद हुसैन ने लगातार प्रयोग किए, हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के व्याकरण से चुनकर राग-रागनियों के स्वरों का इस्तेमाल भी उनका पसंदीदा काम रहा,

1956 की बात है, कोलकाता में अखिल भारतीय शास्त्रीय संगीत सम्मेलन चल रहा था, मैंडोलिन पर सज्जाद हुसैन थे, सम्मेलन में शिरकत कर रहे बाबा अलाउद्दीन खान, बड़े गुलाम अली खान, विनायक राव पटवर्धन, अहमद जान थिरकवा, निखिल बनर्जी और अली अकबर खान जैसे दिग्गज थे, माना जाता था कि मैंडोलिन में ‘मींड़’ का प्रभाव लाना नामुमकिन है, लेकिन सज्जाद ने मैंडोलिन से ‘मींड़’का असर पैदा कर लोगों को अचंभित कर दिया, इम्तिहान लेने के लिए बड़े गुलाम अली खान ने एक मुश्किल लड़ीदार तान अपने गले से निकाली, तो सज्जाद ने उसे मैंडोलिन पर ज्यों की त्यों उतार कर महफिल लूट ली,

सज्जाद हुसैन ने संगीत पिता मुहम्मद अमीर खान से सितार वादन के रूप में सीखा,

मध्यप्रदेश के सीतामऊ में 15 जून, 1917 को एक संगीतज्ञ परिवार में जन्मे सज्जाद हुसैन ने संगीत अपने पिता मुहम्मद अमीर खान से सितार वादन के रूप में सीखा, फिर उन्होंने वीणा, बांसुरी, जलतरंग, वायलिन, पियानो, बैंजो, एकॉर्डियन, गिटार, क्लैरोनेट में भी महारत हासिल की, चौथे दशक के अंत में सज्जाद हुसैन मायानगरी मुंबई में दाखिल हुए, तो वहां भी सुर और ताल की जटिलता से अपने संगीत को अलग आयाम दिया, 1944 में बतौर स्वतंत्र संगीतकार उनकी पहली ही फिल्म ‘दोस्त’ में नूरजहां की आवाज में सजे सबसे मशहूर गीत ‘बदनाम मुहब्बत कौन करे’ को आज तक संगीत प्रेमी याद करते हैं,

सुरैया का गाया ‘गमे आशियां सताएगा कब तक’ खूब पसंद किया गया…

‘बदनाम’ शब्द के बाद तीव्र विराम, अंतरे का चढ़ाव और फिर उतरते हुए मुखड़े में मिलने का कौशल सिर्फ सज्जाद के ही संगीत में था, फिल्म ‘1857’ का राग भैरव और भैरवी के सुरों में गिटार के कॉर्ड्स और वायलिन के नोट्स के साथ सुरैया का गाया ‘गमे आशियां सताएगा कब तक’ खूब पसंद किया गया,

आज मेरे नसीब ने मुझको रुला-रुला दिया’ भी भुलाए नहीं भूलता……

1950 में बनी फिल्म ‘खेल’ से सज्जाद और लता का साथ हुआ और काफी थाट में बागेश्वरी के करीब ‘भूल जा ऐ दिल मुहब्बत का फसाना’ लता के दशक के सर्वश्रेष्ठ गीतों में शुमार हो गया, तो 1951 में आई ‘हलचल’ का लता की आवाज में अरबी शैली की छाया लिए ‘आज मेरे नसीब ने मुझको रुला-रुला दिया’ भी भुलाए नहीं भूलता, खुद सज्जाद भी इस गीत को अपनी सर्वश्रेष्ठ रचना मानते थे। 1952 में आई ‘संगदिल’ व्यावसायिक दृष्टि से सज्जाद की सफलतम फिल्म बनी। दादरा ताल में खमाज और कलावती की छाया लेकर लता का ‘वो तो चले गए ऐ दिल याद से उनकी प्यार कर’ लोगों की जुबान पर चढ़ गया,

ऐसे संगीतकार थे, जिन्हें ‘मौलिक संगीतकार’का खिताब दिया जा सकता है।,

जिद्दी स्वभाव के अप्रतिम फनकार सज्जाद हुसैन 21 जुलाई, 1995 को सदा के लिए शांत हो गए। उनकी मृत्यु पर संगीतकार अनिल बिस्वास ने कहा कि सज्जाद ही एक ऐसे संगीतकार थे, जिन्हें ‘मौलिक संगीतकार’का खिताब दिया जा सकता है।

 

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