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कम मतदान के बाद भी लोकसभा चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत बढा

 

कांग्रेस का वोट प्रतिशत भाजपा के मुकाबले 27 फीसदी हुआ कम

इंदौर, प्रदीप जोशी। लोकसभा चुनाव में मध्यप्रदेश में भाजपा को मिली प्रचंड जीत के कई मायने है। क्योकि वोट प्रतिशत कम होने के बावजूद भाजपा का ना केवल वोट प्रतिशत बढ़ा है बल्कि उसने क्लीन स्वीप करते हुए सारी सीटों पर भगवा फहरा दिया। जीत भी लगभग हर सीट पर रिकार्ड मतों से दर्ज की गई। यानी कांटा पकड़ जैसी स्थिति तो दूर कांग्रेस कड़ी टक्कर देने जैसी स्थिति में भी नहीं रही। भाजपा की इस जीत में प्रदेश संगठन और बड़े नेताओं की एकजूटता के साथ युवा वोटर्स का साथ, लाड़ली बहनों का भरोसा और आदिवासी समूदाय द्वारा इस बार दिया गया भरोसा है। वही कांग्रेस तीन चुनाव में 2 से 1 और अब शून्य पर आ गई। इन तीन चुनावों में उसे लगातार वोट शेयर घटने का झटका भी लगा है। इस बार महज 32 फीसदी वोट उसे प्राप्त हुए है जो भाजपा के मुकाबले 27 फीसदी कम है। उधर बहुजन समाज पार्टी के वोट प्रतिशत में सुधार करती दिखाई दे रही है।

लहर भी थी और सबका साथ भी

मध्यप्रदेश में इस बार चुनावी हवा सबसे अलग बह रही थी। सबका साथ सबका विकास नारे पर जनता को भरोसा था। युवा मतदाताओं की सोच पहले से बन चुकी थी। लाड़ली बहनों का वोट प्रतिशत भले पुरुषों की तुलना में कम हुआ मगर थोक में वोट भाजपा को मिले। राम मंदिर निर्माण की खुशी भी वोट के रूप में खूब बरसी इन सबके बीच मोदी जी की लहर ने भी परिणामों पर खासा असर किया। यह सिर्फ इस चुनाव की बात नहीं है जिसमे मत प्रतिशत बढ़ा। बीते दो दशक में हुए चार चुनावों पर नजर डाले तो हर बार वोट प्रतिशत बढ़ा ही है। यानी 40 प्रतिशत से बढ़ते हुए अब 59 प्रतिशत से ज्यादा पर भाजपा पहुंच चुकी है।

अपने जनाधार को बचाने में नाकाम कांग्रेस

एक दो प्रतिशत वोट घटने बढ़ने से सीटों पर खास प्रभाव नहीं पड़ता। यह 2018 के विधानसभा चुनाव में देखा गया था। इस चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत कांग्रेस से ज्यादा था बावजूद इसके कांग्रेस ने 114 सीट हासिल की वही भाजपा 109 सीटों पर ही सिमट गई। तब कांग्रेस ने अन्य दलों और निर्दलीयों के सपोर्ट से सरकार बना ली थी। यह अलग बात है कि वह सरकार सिर्फ पंद्रह महीने ही टिक पाई। बहरहाल उस वक्त का वोट प्रतिशत कांग्रेस स्थाई नहीं रख पाई। या कह सकते है कि पार्टी में क्षेत्र, वर्ग, जाति और मुद्दे आधारित अध्ययन किया ही नहीं जाता। प्रदेश में लगातार जनाधार कम होने के पीछे भी प्रमुख कारण यहीं है।

सिर्फ औपचारिकता निभा रहे थे नेता

लोकसभा चुनाव की घोषणा से पहले ही कांग्रेस ने तैयारी शुरू कर दी थी। तारीख घोषित होने के बाद प्रदेश की कुछ सीटों पर प्रत्याशियों के नाम भी घोषित कर दिए गए थे। पहले चरण के मतदान से पहले ही पार्टी में बिखराव शुरू हो गया। पार्टी छोड़ने की मची हौड़ के बीच पूरा संगठन ही बिखर गया और चुनावी रणनीति, काम सब औपचारिकता बन गए। कमलनाथ, दिग्विजय सिंह जैसे बड़े नेता अपने अपने क्षेत्र में उलझ कर रह गए। जीतू पटवारी, उमंग सिंघार और अरुण यादव के हाथ में कमान थी और दोनों ही नेता की पहचान क्षेत्रीय है। पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह की कोई भूमिका चुनाव में नजर नहीं आई। डॉ.गोविंद सिंह ग्वालियर क्षेत्र नहीं छोड़ सके। एआईसीसी प्रभारी सचिव संजय कपूर, सज्जन वर्मा, विवेक तंखा जैसे नेता औपचारिकता निभाते रहे।

ये कैसे सितारे जो चमके ही नहीं

कांग्रेस की स्टार प्रचारकों की सूची में कई बड़े नेताओं और पूर्व मंत्रियों के नाम भी थे। ये वो सितारे थे जो पूरे चुनाव में चमके ही नहीं। जयवर्धन सिंह राजगढ़ में और डॉ विक्रांत भूरिया रतलाम झाबुआ में पिता के चुनाव में जुट गए। पूर्व मंत्री बाला बच्चन का भक्ति संगीत सिर्फ छिंदवाड़ा में ही सुनाई दिया। पूर्व मंत्री सुरेंद्र सिंह बघेल हनी, अशोक सिंह, सी पी मित्तल, एनपी प्रजापति, लखन घनघोरिया, हेमन्त कटारे, राजेंद्र कुमार सिंह, आरिफ मसूद, मीनाक्षी नटराजन, हिना कांवरे, सुखदेव पांसे, रजनीश सिंह, विभा पटेल, साधना भारती, कुणाल चौधरी, आशुतोष चौकसी ये नाम सिर्फ कांग्रेस के प्रेस नोट में दिखे मैदान में नहीं।

दो चुनावों का मत प्रतिशत

लोकसभा चुनाव 2019

भारतीय जनता पार्टी -58 प्रतिशत

कांग्रेस -34.5 प्रतिशत

बहुजन समाज पार्टी -2.4 प्रतिशत

लोकसभा चुनाव 2024

भारतीय जनता पार्टी -59.43 प्रतिशत

कांग्रेस -32.30 प्रतिशत

बहुजन समाज पार्टी -3.22 प्रतिशत

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