अन्याय के विरोधी तथा सतोगुण की प्रतिष्ठा करने वाले सामाजिक क्रांति के जनक है भगवान परशुराम जी

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प्रस्तुति -ओमप्रकाश बटवाल
मल्हारगढ़ जिला-मंदसौर म.प्र.
मोब. 94251 06594
वर्तमान समय में हमारे समाज में बढ़ते अन्याय, अत्याचार व पापाचार को देखते हुए भगवान परशुराम की शिक्षाओं व संदेशों को नए सिरे से समझने की आवश्यकता है. जिस तरह से राम, श्रीकृष्ण और शिव किसी जाति विशेष या समुदाय के भगवान नही है, उसी तरह से परशुराम केवल ब्राह्मणों के भगवान नही हो सकते. वे सबके है. जनकल्याण के लिए परशुराम जी ज्ञान और विग्रह दोनों को ही आवश्यक मानते थे. नम्रता और ज्ञान से सज्जनों को और प्रतिरोध तथा सजा से दुष्टों को जीता जा सकता है. ऐसी उनकी निश्चीत मान्यता थी. उनके अनुसार मुख से चारो वेदों का प्रवचन करके और पीठ पर धनुष बाण लेकर चला जाए. ब्रह्म शक्ति और शस्त्र शक्ति दोनों ही आवश्यक है. शास्त्र और शस्त्र से भी धर्म का प्रयोजन सिद्ध करना चाहिए
धर्म ग्रंथो के अनुसार परशुराम जी का जन्म अक्षय तृतीया वैशाख शुक्ल तृतीया को हुआ था. ऋषि जमदगिन व रेणुका की पांचवी संतान के रूप में परशुराम जी पृथ्वी पर अवतरित हुए थे. हैंहय वंश के कार्त वीर्य अर्जुन की वंश बेल 21 बार नष्ट करने के पीछे यूं तो परशुराम जी का प्रतिकार ही प्रमुख था किंतु ऐसा कर यह बात जरूर स्थापित कर दी कि ज्ञान और तप का सम्मान सभी को करना होगा क्योंकि ये भारतीय संस्कृति के आधार बिंदु है
इतिहास में वर्णित हैं कि कार्त वीर्य अर्जून के पुत्रों ने बल पूर्वक कामधेनु गाय प्राप्त करने के लिए ऋषि जमदगिन का वध कर दिया था. कार्त वीर्य को भगवान दत्तात्रेय की कृपा से हजार भुजाओं का वरदान मिल गया था. दंभ से भरपुर कार्त वीर्य अर्जून विप्र समाज को हैंय समझता था. ब्राह्मणों, विद्वानों और ऋषियों का तिरस्कार करना और उनका वध कर देना उनके लिए खेल था. परशुराम जी ने इसी का दंड राजा को दिया. ग्रंथो मे वर्णित हैं कि सहस्त्र बाहु कार्त वीर्य अर्जून ने भृगुवुल का 21 बार मान हरण किया और प्रतिकार स्वरुप परशुधारी ऋषि ने उसके वंश का 21 बार संहार किया.परशुरामजी साधारण ऋषि नही थे. पौराणिक ग्रंथों में बताया गया है कि वे विष्णु के छठे अवतार थे. उन्होंने पशुपति शंकर की निरंतर साधना की
आशिर्वाद स्वरुप शिव ने उन्हें अपना परशु दिया और उसे धारण करने के कारण ही ऋषि को परशुरम अर्थात परशु युक्त राम कहा गया. श्री परशुराम जी एक ऐसे योद्धा है जो अपने ब्रह्म तेज पर भरोसा करते हुए क्षत्रियोचित कर्म के लिए शस्त्र उठाते हैं. उनका आत्मबल अपरिमित था.वे संपूर्ण सत्य को चाहने वाले पुरुषार्थी है. वे सतोगुण की प्रतिष्ठा के लिए क्रांति को अपरिहार्य बताते हैं. परशुरामजी की लड़ाई किसी वर्ग या जाति से नहीं अपितु रजोगुणी अहंकार और उच्चखल वासनाओं से है
वे केवल दान, धर्म, जप,तप, व्रत उपवास को ही धर्म के लक्षण नही मानते थे अपितु अनीति से लड़ने का कठोर व्रत लेना भी धर्म साधना का एक अंग मानते हैं. उनके अनुसार अधर्म का उन्मूलन और धर्म का संस्थापन एक ही रथ के दो पहिया है. परशूराम जी ने सत्य की रक्षा के लिए क्रोध की अनिवार्यता को नैतिक करार दिया. उन्होंने बताया है कि योद्धा में भगवान पाने की योग्यता है. मानव सभ्यता के इतिहास में पहले क्रांतिकारी हैं जिन्होंने सामाजिक क्रांति की पहल की
श्रीमद भागवत पुराण में बताया गया है कि परशुराम जी चिरंजीवी है. अश्वथमा, हनुमान जी और विभीषण के भांति प्रभु स्वरुप परशुराम जी के संबंध में यह बात मानी जाती हैं. आज शास्त्रगत ज्ञान और सांस्कृतिक उच्चता की स्थापना के लिए भगवान परशुराम जी से प्रेरणा प्राप्त करनी होगी.



