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01अप्रैल से स्कूल खोल दिए बाजार में किताबें नहीं स्कूल में बच्चे नहीं-श्री चन्द्रे

 

मन्दसौर। कुछ वर्षों से शासन ने एक नई परंपरा शुरू की है कि मार्च में परीक्षाफल घोषित करके फिर 01अप्रैल से स्कूल शुरू किए जाते हैं जो 30 अप्रैल तक चलते है।तथा उसके बाद ग्रीष्म अवकाश दिया जाता है। उक्त व्यवस्था पूर्णतः अव्यवहारिक है तथा इस व्यवस्था को विद्यार्थियों, अभिभावकों और शिक्षकों ने मन से कभी स्वीकार नहीं किया। यही कारण है कि अनमने मन से यह एक महीने का टाइम पास किया जाता है। इस व्यवस्था को तुरंत बंद कर देना चाहिए।उक्त विचार व्यक्त करते हुए शिक्षाविद् रमेशचन्द्र चन्द्रे ने कहा कि परीक्षाफल घोषित होने के बाद बच्चे बिल्कुल भी पढ़ाई के मूड में नहीं रहते और स्कूल संचालक तथा शिक्षक भी पढ़ाने के मूड में नहीं रहते इसलिए कक्षाओं में बच्चों की उपस्थिति बहुत कम होती है। इसके साथ ही बच्चों के कोर्स की किताबें बाजार से गायब रहती है क्योंकि अनेक कक्षाओं के पाठ्यक्रम में परिवर्तन होने के कारण समय पर पाठ्य पुस्तकें प्रकाशित नहीं हो पाती, इसलिए यह अप्रैल महीना स्कूली शिक्षा के लिए पूर्णता निरर्थक है।श्री चन्द्रे ने कहा कि अनेक विद्यार्थी परीक्षा के बाद अपने परंपरागत काम धंधो में अपना मन लगाते हैं कोई मैकेनिक लाइन काम सीखता है।कारपेंटरी बिजली फिटिंग इत्यादि काम को सिखाने में अपना समय लगता है तो कोई कोई अपने पिता की दुकान संभालता है तथा विभिन्न व्यवसायों का प्रशिक्षण प्राप्त करता है।इसके साथ ही प्राइवेट स्कूलों में नए शिक्षकों की नियुक्ति नए शैक्षिक संसाधन इत्यादि की तैयारी शुरू होती है इसलिए स्कूल संचालक भी 1 मिनट से मानसिक रूप से स्कूल चलाने में सक्षम नहीं होते। अतएव स्कूल या तो 1 जून से खोले जाएं या फिर 1 जुलाई खोले जाने चाहिए।

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