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मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजों में सिंधिया कि अग्नि परीक्षा

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महारथियों की जीत से तय होगी केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की ताकत, कइयों की डोल रही कुर्सी

पंकज पाराशर

छतरपुर- मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजों से न सिर्फ प्रदेश की सरकार तय होगी बल्कि कई दिग्गज नेताओं की ताकत भी निर्धारित करेगी। इनमें सबसे महत्वपूर्ण केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं। अपने समर्थक विधायकों की संख्या की वजह से कांग्रेस दहाड़ते रहते थे। उनकी नहीं सुनी गई तो उन्होंने कांग्रेस की सरकार गिरा दी थी। उनके विधायकों की वजह से ही मध्य प्रदेश में फिर से बीजेपी की सरकार बनी है। इस बार उनके अधिकांश वफादार चुनावी मैदान में हैं। उन्हें अगर जीत मिलती है तो ज्योतिरादित्य सिंधिय की ताकत बीजेपी में बरकार रहेगी। ज्योतिरादित्य सिंधिया इस बात को अच्छी तरह से समझते हैं।

यही वजह है कि अपने समर्थकों की जीत पक्की करने के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इस चुनाव में पूरी ताकत झोंक दी थी । ग्वालियर चंबल अंचल में उन्होंने इस बार धुआंधार प्रचार किया है। ऐसे में विधानसभा चुनाव के नतीजे ही पार्टी में उनकी धाक तय करेगी। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ बीजेपी में आने वाले अधिकांश बड़े चेहरों को टिकट मिला है। इनकी जीत पर ही महाराज का भविष्य निर्भर है । विधानसभा चुनाव केंद्रीय मंत्री सिंधिया के लिए किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं है। उनका आगे का सफर बीजेपी में कैसा रहेगा, यह उनके समर्थकों की जीत पर निर्भर है।

सिंधिया के बड़े समर्थक जिन पर सबकी निगाहें

ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ आने वाले उनके बड़े समर्थकों में सांवेर से तुलसी सिलावट, ग्वालियर से प्रद्युमन सिंह तोमर, सुरखी से गोविंद सिंह राजपूत, डबरा से इमरती देवी, महेंद्र सिंह सिसोदिया, उद्योग मंत्री राजवर्धन सिंह दत्तीगांव, सुरेश राठखेड़ा, प्रभुराम चौधरी, मनोज चौधरी को हाटपिपल्या, हरदीप सिंह डंग को सुवासरा, बृजेन्द्र सिंह यादव को मुंगावली, बिसाहूलाल सिंह को अनूपपुर, कमलेश जाटव को अम्बाह, रघुराज कंसाना को मुरैना, ऐंदल सिंह कंसाना को सुमावली और जजपाल सिंह जज्जी समेत ऐसे कई चेहरे हैं, जिनकी जीत सिंधिया के लिए जरूरी है।

बुंदेलखंड में सिंधिया परिवार से जुड़े रहे गोविंद सिंह राजपूत

दरअसल, केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता स्व. माधवराव सिंधिया ने जब कांग्रेस छोड़कर अपनी पार्टी बनाई थी। उस समय सागर में नई पार्टी का झंडा उठाने वाले सबसे पहले व्यक्ति गोविंद सिंह राजपूत थे। तभी से गोविंद सिंह राजपूत को ग्वालियर राजघराने का बेहद करीबी माना जाता है। तभी से ना तो गोविंद सिंह राजपूत ने सिंधिया परिवार को छोड़ा और ना ही सिंधिया परिवार ने। ऐसा ही जुड़ाव ज्योतिरादित्य सिंधिया का तुलसी सिलावट, प्रभु राम चौधरी, महेंद्र सिंह सिसोदिया, इमरती देवी और प्रद्युमन सिंह तोमर से भी माना जाता है।

इन पर है सबकी नजर

वहीं, ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 2018 में बनी कांग्रेस की सरकार को 2020 में ठोकर मार दी थी। इसके साथ ही उन्होंने बीजेपी की सदस्यता ग्रहण कर ली थी। उनके साथ उनकी पूरी पलटन भी बीजेपी में शामिल हो गई थी। प्रदेश में हुए उपचुनाव में उनके 16 समर्थकों को जीत मिल गई थी। इसके बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया का कद बीजेपी में काफी बढ़ गया था। सिंधिया के बढ़ते कद से अभी तक बीजेपी में पुराने भाजपाई परेशान रहे हैं। नेतृत्व की वजह से पुराने भाजपाइयों के साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया भी तालमेल बिठाकर चलते हैं। वहीं, बीजेपी चुनावी रैलियों में मंच से ज्योतिरादित्य सिंधिया को बढ़ावा देती रही हैं। आगे यह तभी बरकार रहेगा, जब उनके वफादारों की जीत होगी।

महारथियों की 2020 में हो गई थी हार

2020 में हुए उपचुनाव में डबरा से इमरती देवी, सुमावली से ऐंदल सिंह कंसाना और मुरैना से रघुराज सिंह कंसाना चुनाव हार गए थे। इसके बावजूद सिंधिया समर्थक इन नेताओं को बीजेपी ने फिर चुनाव मैदान में उतारा है। हालांकि सिंधिया समर्थक 7 नेताओं को उपचुनाव में चुनाव जीतने के बाद भी पार्टी ने इस बार उन्हें चुनाव में नहीं उतारा। इनमें ओपीएस भदौरिया, रक्षा सनोरिया, सुमित्रा देवी कास्डेकर को टिकट नहीं दिया। जबकि रणवीर जाटव, जसवंत जाटव और गिरिराज दंडौतिया उपचुनाव में चुनाव हार गए थे। इस चुनाव में भी इन्हें टिकट नहीं मिला है। मध्य प्रदेश में 2023 के विधानसभा चुनाव परिणाम ज्योतिरादित्य सिंधिया की ताकत का भी फैसला करेंगे। 2018 में जब ग्वालियर चंबल संभाग में 34 में से कांग्रेस ने 26 सीटें जीती थी तो दावा किया जा रहा था कि इसके पीछे सिंधिया का जादुई व्यक्तित्व है। अब सिंधिया भारतीय जनता पार्टी में हैं। 2018 में चुनाव जीते उनके समर्थक भी कांग्रेस की जगह भाजपा प्रत्याशी के रूप में मैदान में हैं। अब उनकी हार और जीत ही भाजपा में सिंधिया के रसूख का फैसला करेगी।

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