मंदसौरमंदसौर जिला

संतों की शरण में रहने से सत्ता सुरक्षित-सम्मानित रहती है- स्वामी मणी महेशचैतन्यजी

 

ब्रह्मलीन स्वामी भागवतानंदजी महाराज का मनाया 10वां महानिर्वाण (पुण्यतिथि) महोत्सव-किया गया पौधारोपण
मन्दसौर। श्री चैतन्य आश्रम मेनपुरिया में 2 नवम्बर 2023 कार्तिक कृष्ण पक्ष पंचमी को भगवान पशुपतिनाथ महादेव मंदिर के संस्थापक अधिष्ठाता ब्रह्मलीन श्री प्रत्यक्षानंदजी महाराज के  प्रमुख शिष्य ब्रह्मलीन पूज्य स्वामी भागवतानन्दज महाराज का दशम निर्वाण (10वीं पुण्यतिथि) महोत्सव पूज्य स्वामी श्री मणि महेशचैतन्यजी महाराज एवं पूज्य स्वामी श्री मोहनानन्दजी महाराज के सानिध्य में मनाया गया।
प्रारंभ में स्वामी भागवतानंदजी के समाधि मंदिर में उनके श्री विग्रह का पूजन अभिषेक आरती की गई । श्री पशुपतिनाथ संस्कृत पाठशाला तथा नयाखेड़ा गुरूकूल आश्रम के बटूकों द्वारा सरस्वती वाचन के साथ पं. श्री विष्णु शर्मा धारियाखेड़ी, पुजारी दिनेश शर्मा द्वारा पूजन विधि सम्पन्न कराई गई।
स्वागत उद्बोधन एवं संचालन ट्रस्टी बंशीलाल टांक ने दिया व आभार लोकन्यास अध्यक्ष प्रहलाद काबरा ने माना।
कार्यक्रम के समापन के पश्चात् आश्रम में फलदार पौधे श्रीफल (नारियल) आम, जामुन  तथा औषधीय पौधे पीपल, हरसिंगार, गूलर, अपराजिता आदि का रोपण किया गया।
स्वामी श्री मणि महेशचैतन्यजी महाराज ने सनातन से भारत जो विश्व गुरू पद पर सुशोभित रहा है उसमें प्रमुख अहं भूमिका रही है संतों की। सत्ता भी तभी सम्मानित और सुरक्षित रही जब वह संतों के के आश्रय में रही है। भगवान राम के रामराज्य का उदाहरण इसीलिये दिया जाता है कि भगवान राम गुरू वशिष्ठ की आज्ञा पाकर उनके निर्देश आज्ञानुसार सत्ता का संचालन करते थे। आपने कहा भारत का यह सौभाग्य है कि भारत पुनः उसी परम्परा पर लौट रहा है जब सत्ता संतों के मार्गदर्शन में उनकी आज्ञानुसार संचालित हो जिससे प्रजा में परस्पर  प्रेम, स्नेह, सौहार्द स्थापित रहकर प्रजा को शारीरिक-मानसिक किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं हो। आपने कहा कि वर्तमान में ग्रह-परिस्थितियां सभी अनुकूल है और यही काररण है कि जहां संपूर्ण विश्व युद्ध और आतंकवाद की लपटों में झूलस रहा है वहीं भारत का अध्यात्मकवाद इन लपटों को शांत करने अध्यात्म की शीतल बुंदों का छिड़काव कर उसे बुझाने, शांत करने का भरसक प्रयास कर रहा है। विश्व गुरू पद पर प्रतिष्ठित व स्थापित करने में भारत का सनातन मूल मंत्र वसुधैव कुटुम्बकम का रहा है। जिसके लिये आपने वर्तमान योग ऋषि स्वामी रामदेवजी, गौरख सम्प्रदाय के गुरू आदित्यनाथजी, साध्वी उमा भारतीजी आदि संतों का उदाहरण दिया।
विद्याध्ययन नौकरी के लिये नहीं विद्वान प्रज्ञावान बनने के लिये होना चाहिये- स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाले बच्चों-छात्रों से जब पूछा जाये कि वे पढ़कर क्या बनना चाहते हैं ? उत्तर मिलता है कोई डॉक्टर, कोई इंजीनियर, कोई कलेक्टर, कोई एस.पी. आदि बनना चाहता है अर्थात नौकरी करना चाहता है परन्तु यह जब तक भावना में, मन में नौकरी की लालसा है तब तक वह नौकर ही बनकर रहेगा मालिक नहीं बन सकता और समाज में मालिक जिस सम्मान के साथ जीता है वह आनन्द शांति सुख नौकर नहीं पा सकता। इसलिये पढ़ने का उद्देश्य नौकरी नहीं विद्वान बनना होना चाहिये।
स्वामी भागवतानंदजी से बचपन में दर्शन करने के बाद स्वामी का स्नेह, स्वामीजी के प्रेरणास्पद आर्शीवचन को स्मरण करते स्वामी मणी महेश चैतन्यजी ने कहा कि स्वामी प्रत्यक्षदेव के ब्रह्मलीन होने के पश्चात् स्वामी भागवतानंदजी ने स्वामी प्रत्यक्षानंदजी के प्रमुख शिष्य होने का दायित्व का पूर्ण निष्ठा जवाबदारी और समर्पण के साथ निर्वाह करते हुए स्वामी भागवतानंदजी ने मंदसौर-मालवा म.प्र. ही नहीं राजस्थान, गुजरात आदि दुरूस्थ स्थानों में जाकर भगवान पशुपतिनाथजी की महिमा को दूर-दूर तक प्रचारित प्रसारित किया। भागवत कथा प्रवचनों के माध्यम धर्म जागरण किया।
उपस्थित रहे- श्री चैतन्य आश्रम लोक न्यास अध्यक्ष प्रहलाद काबरा, ट्रस्टीगण ब्रजेश जोशी, बंशीलाल टांक, प्रद्युम्न शर्मा, शिवनारायण शर्मा, महेश शर्मा, राजेश शर्मा, हेमन्त शर्मा, हेमन्त परमार, गोवर्धन, बगदीराम अमलेश्वर, सरपंच परमानन्द मीणा अमलेश्वर, विष्णु बसेरा, गोपाल नाथुखेड़ी, अम्बालाल नागदा भालोट सहित श्रद्धालुजन उपस्थित रहे।

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