अर्चपूर्णाश्री जी म.सा. के वैराग्य वासित विरति जीवन के 42 वे बसंत में प्रवेश निम्मिते द्वि दिवसीय भक्ति महोत्सव

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झारड़ा ।कलयुग की विषम परिस्थितियों में साधु जीवन जीना दुर्लभ है ऐसे दुषम काल में जैन भागवती दीक्षा पालन करना और भी कठिन है परंतु कुछ आत्माएं विरले होती है जो जप, तप, चारित्र एवं भगवान महावीर के संयम मार्ग पर चलकर स्वयं एवं अनेक आत्माओं का कल्याण करती है ऐसे ही झारडा के परम उपकारी साध्वीवर्या अर्चपूर्णा श्री जी म. सा. जिनका जन्म 16. 7.1962 को इंदौर में हुआ मातुश्री धर्मगौरी बेन एवं पिता नगीन लाल जैन के संस्कारों से बचपन से ही परमात्मा की वितरागता से प्रभावित हो 20 वर्ष की उम्र में 19.2.1982को भागवती दीक्षा ग्रहण करी दीक्षा काल में अनेक तपस्या, सिद्धि तप, धर्म चक्र तप गौतम लब्धि तप, विश स्थानक ओली, 500 आयम्बिल, वर्धमान तप की 35 ओली आदि अनेक तपस्या आपके जीवन का आभूषण बनी गुजरात, महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, आदी राज्यों में हजारों किलोमीटर की विहार पदयात्रा कर जीवदया, अहिंसा की ज्योत जनमानस में जगाई, आपकी मातोश्री भी दीक्षा ग्रहण कर धन्य पूर्णाश्री जी कहलाए, एवं बहन ने भी दीक्षा ली जो भक्ति पूर्णा श्रीजी नाम से शोभित हुए 41 वर्ष स्वयं जीवन के पूर्ण होने एवं 42 वर्ष में प्रवेश के निमित्त झारड़ा जैन श्री संघ में गुरु वधामना का कार्यक्रम आयोजित किया गया अखंड अक्षतसे गुरुदेव को पाट पर विराजमान कर वधाया गया, गुरुदेव से आशीष वचन, एवं आशीर्वाद लिए गए पश्चात दो दिवसीय महोत्सव में आज जिनालय में 18 अभिषेक का मंगलकारी विधान रखा गया, जिसका लाभ समस्त लाभार्थी संघ सदस्योंने लिया दोपहर में समूह सामूहिक आयोजन हुआ, विधि-विधान पंकज नवलखा द्वारा कराया गया, संगीतकार गोपाल भाईद्वारा बहुत सुंदर भजनों की प्रस्तुति दी गई जानकारी जैन श्री संघ मीडिया प्रभारी सुनील जैन रामसना द्वारा दी गई।