धर्म संस्कृतिमध्यप्रदेश

शामगढ़ की बेटी वंदना शिवहरे के मार्गदर्शन में टाउनहॉल में चल रहे 20 दिवसीय प्रशिक्षण शिविर में प्रशिक्षण ले रहीं छात्राएं

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बुन्देलखंड की सुरेती कला विलुप्त होने की कगार पर, जीवित रखने के लिए 35 छात्राएं ले रहीं प्रशिक्षण

दतिया : -किसी गांव के भ्रमण करने पर घरों के मुख्य दरवाजे की दोनों ओर एक भित्ति चित्र बना अक्सर देखने को मिलता है। दरअसल यह बुन्देलखंड का पारंपरिक भीति चित्र है। जिन्हें कुलदेवी देवताओं के रूप में गेवरी (लाल चूना) से जालीनुमा बनाया जाता है। दीपावली के अवसर पर इन्हें खासतौर से घरों के दरवाजों की पुताई के बाद उकेरा जाता है। बन रहे पक्के मकान व महिलाओं की कम रुचि से बुन्देलखंड की यह पारंपरिक कला विलुप्त हो रही है। इसे जीवित रखने व रोजगार का माध्यम बनाने के लिए पर्यटन विभाग प्रयास कर रहा है। महिलाओं के लिए सुरक्षित पर्यटन योजना के तहत हरीतिका संस्थान के माध्यम से शहर के टाउनहॉल में चल रहे 20 दिवसीय प्रशिक्षण शिविर में 35 युवतियां व महिलाएं इसका प्रशिक्षण ले रहीं है।

प्रशिक्षण में शामिल लोक कलाकार शिवपुरी निवासी वंदना शिवहरे बताती हैं कि, सुरती (मांडनों) को श्री और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि जिसके घर में इसका सुंदर अंकन होता रहता है, वहां लक्ष्मी निवास करती हैं। इस पारंपरिक आकृतियों में ज्यामितीय एवं पुष्प आकृतियों के साथ ही त्रिभुज, चतुर्भुज, वृत्त, कमल, शंख, घंटी, स्वास्तिक, शतरंज पट का आधार, कई सीधी रेखाएं, तरंग की आकृति आदि मुख्य हैं। हवन और यज्ञों में वेदी का निर्माण करते समय भी मांडने बनाए जाते हैं। इसे सफेद खड़िया या पोथनी और गेरू रंग से बनाया जाता है प्रशिक्षण में हरीतिका संस्थान योगेंद्र यादव और कौशल विकास केंद्र से अंजली यादव छात्राओं को प्रशिक्षण दे रहीं हैं।

गांव व शहर में पक्के आंगन बन रहे इसलिए विलुप्त हो रही कला –

लोक कलाकार वंदना शिवहरे मंदसौर जिले के #शामगढ़ की बेटी है। वे बताती हैं कि, पहले मकानों में आंगन व दीवारें कच्ची होतीं थीं तब महिलाएं घरों में जमीन और दीवारों पर मांडना उकेरती थीं। अब गांव व शहर में पक्के आंगन और दीवारें हैं। इसलिए लोग इस कला को भूलते जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि इस कला को वह 15 साल से दीवारों पर उकेरने का काम कर रही हैं। वॉल पेंटिंग के लिए मांडना कला को आज पहचान मिल रही है। कैमिकल कलर्स से इसे लंबे समय तक जीवित रखा जा सकता है। लेकिन यदि पूजा पाठ में इसका उपयोग करना है तो फिर पारंपरिक कलर्स से ही इसे बनाया जाना चाहिए।

15 फरवरी तक चलेगा प्रशिक्षण, अंतिम चरण में सिखाई जा रही वॉल पेंटिंग

जिला पुरातत्व पर्यटन एवं संस्कृति परिषद के नोडल अधिकारी एडीएम रूपेश उपाध्याय ने बताया कि मप्र पर्यटन बोर्ड स्थानीय कलाओं को बढ़ावा देने का काम कर रहा है। अभी यह शिविर 15 फरवरी तक चलेगा। लोक कलाकार शिवहरे के मुताबिक इस शिविर में अब तक प्रशिक्षणार्थियों को लकड़ी के उत्पादों, मिट्टी के मटके, पॉट और खिलाने पर मांडना बनाना सिखाया गया है। पेपर क्रॉफ्ट और पेंटिंग भी सिखाई जा चुकी है। अब अंतिम चरण में वॉल पेंटिग्स सिखाई जा रहीं हैं।

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