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संजय गौड़ की कलम से
नीमच। यह देखने में आ रहा है कि जिले के कई शासकीय कार्यालयों में कार्यरत कर्मचारियों ने अपने पुत्र या पुत्रीयों को कुर्सियों पर लाकर बिठा दिया है। आखिर कैसे इन्हें चयनित कर लिया जाता है। क्या इन कर्मचारियों के बच्चों के अलावा दूसरे बच्चों में योग्यता नहीं होती है ? क्यों नहीं बिना भाई भतीजा वाद वाले बच्चे इनसे ज्यादा पढ़े लिखे और योग्यता वाले हो सकते हैं। परंतु इस भाई भतीजावाद के चलते वह नौकरियों के लिए दर-दर भटक रहे हैं। कुछ कर्मचारियों में तो शासकीय कुर्सी का ऐसा नशा है कि रिटायर होने के बाद भी उस ही विभाग में कार्य करने के लिए अपनी जुगाड़ तलाश कर बिठा लेते हैं। कई बार तो जागरूक मीडिया को आपत्तियां तक लगानी पड़ी। एक विभाग का स्टेनो रिटायर के बाद फिर आवेदन लगा चुका था नौकरी के लिए तो क्या यह शासकीय कार्यालय भी नेताओं की अपने बच्चों को दी जाने वाली कुर्सी की तर्ज पर नजर आ रहे हैं। पिछले दिन हमने सूचना का अधिकार में एक विभाग के कुछ कर्मचारियों के दस्तावेज एवं नियुक्ति आदेश मांगे तो अपील में भी वह नहीं उपलब्ध कराए जा रहे हैं, यह सच्चाई है। कुछ कर्मचारी अधिकारियों की चापलूसी कर अपने बच्चों को कार्यालयो में लाकर फिट कर लेते हैं। अब सूचना के अधिकार में ऐसे आउटसोर्स कर्मचारीयों उनके नाम और पिता के नाम सहित सूचियां प्राप्त होने परभाई भतीजावाद की कलाई भी खुल जाएगी। जनसुनवाई में कई बार ऐसी शिकायतों का आवेदन दिए जा चुके हैं। पर जिम्मेदार अधिकारियों की मिली भगत के चलते कोई कार्रवाई नहीं होती है। पिछले दिनों जिले के बड़े कार्यालय में किसी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को तो लेनदेन के चलते जहां चतुर्थ श्रेणी का पद ही नहीं होता है वहां उसे कंप्यूटर पर लाकर बिठा दिया जाता है। जिन योग्य बच्चों का कोई पिता या माता शासकीय कर्मचारी नहीं है? और उनके पास कोई सोर्स भी नहीं है?तो क्या वह यूंही दर-दर भटकते रहेंगे?और कुछ कर्मचारी अपने बच्चों को इसी तरह कार्यालयों में आउटसोर्स के नाम पर फिट करते रहेंगे? सूचना का अधिकार में ऐसे कर्मचारियों का व उनके कार्यरत बच्चों का शीघ्र खुलासा किया जाएगा।*पिछले दिनों अपना वार्ड छोड़कर दूसरे वार्ड से चुनाव लड़ने वाला मामूली सा नेता किसी कार्यालय में यह कहता नजर आया कि शहर में पत्रकार बहुत हो गए। क्योंकि ऐसे नेताओं की गोदी मीडिया नहीं सोशल मीडिया की पोल खोलती है व्हाट्सएप समाचारों के जरिए कि किस तरह ठेके लेते हैं। या फिर ठेका नहीं होने पर दूसरे ठेकेदार के कार्यों को रुकवा देते हैं। कुछ छूट भैया तो कुछ शासकीय कार्यालयों में कुर्ता पजामा पहन कर दलाली करते भी देखे जा रहे हैं ।