माथे पर तिलक और सिर पर चोटी हमारी पहचान, जिसे हम ही भूलते जा रहे – संत श्री ज्ञानानंदजी महाराज

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मन्दसौर। श्री केशव सत्संग भवन खानपुरा में ज्ञानानंदजी महाराज हरिद्वार द्वारा श्रीमद भागवत कथा के एकादश स्कंद का वाचन किया जा रहा है। जिसका श्रवण करने के लिए बडी संख्या में भक्तगण पधार रहे है।
शुक्रवार को धर्म सभा में संतश्री ज्ञानानंदजी महाराज ने बताया कि ईश्वर का स्वरूप दिव्य होता है जिसमें सिर्फ पुण्य और गुण होते है। लेकिन मनुष्य जीव में पुण्य और पाप दोनो होते है उसी प्रकार पशु जीव में सिर्फ पाप होते है उन्हें पुण्य का ज्ञान नहीं होता है। इसलिए मनुष्य जीवन में रहकर हम पाप और पुण्य दोनों कर सकते है हम तय करना होता है कि हमें क्या करना है। संतश्री ने कहा कि भगवान में गुण ही गुण होते है उनमें ध्यान लगाकर भगवान के नाम का गुणानुवाद करके हम अपने जीवन को सार्थक कर सकते है। आपने कहा कि भगवान के दरबार में जो जैसे कर्म करता है वैसा फल पाता है। आपने कहा कि ईश्वर से जुडोगे तो भक्ति और कथा में मन लगेगा जिससे आपका ज्ञान बढेगा और वैराग्य उत्पन्न होगा।
धर्म सभा में संतश्री ने कहा कि माथे पर तिलक और सिर पर चोटी हिन्दू सनातनियों की पहचान है लेकिन हम शर्म के कारण इन दोनों को ही भूल चुके है। हम आगे रहकर अपने चिन्ह और अपनी पहचान को खो रहे है। दक्षिण भारत के लोगों को देखो माथे पर चंदन और आज भी लूंगी पहनते है अपनी संस्कृति नहीं भूलते आपने कहा कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री दैवेगोडा जी जब प्रधानमंत्री रहे तब भी लूंगी पहनते थे लेकिन हम लोग शर्म के कारण अपनी पहचान भूला रहे है। ऐसा नहीं होना चाहिए सभी हिन्दूओं को माथे पर तिलक अवश्य लगाना चाहिए। आपने कहा कि आधुनिकता की चका चौंध में महिलाओं ने भी अपने नियमों को पालन करना छोड दिया है ऐसा नहीं होना चाहिए।
लोग क्या कहेंगे यह भूल जाओं
धर्म सभा मे संतश्री ने कहा कि हम अपने धर्म से इसलिए दूर हो रहे है कि लोग क्या कहेंगे यह सब भूल जाओं प्रभु भक्ति में मन लगाओं उसमें डूब जाओं, प्रभु का नाम लेने में कोई शर्म नहीं होना चाहिए। शास्त्रों में भी कहा गया है कि प्रभु भक्ति में मन लगाने में और अपनी भक्ति दिखाने में कोई लाज शर्म नहीं आना चाहिए।
धर्म सभा के अंत में भगवान नारायण की स्तुति की गई और आरती कर प्रसादी वितरण किया गया। इस अवसर पर केशव सत्संग भवन के अध्यक्ष जगदीशचंद्र सेठिया, सचिव कारूलाल सोनी, प्रहलाद काबरा, मदनलाल गेहलोत, पुरूषोत्तम बडसोलिया, राधेश्याम गर्ग, पं शिवनारायण शर्मा, इंजिनियर आरसी पाण्डे, आर सी पंवार, राव विजयसिंह, कन्हैयालाल सोनगरा, जगदीश गर्ग, कन्हैयालाल रायसिंघानी, शंकरलाल सोनी, जगदीश भावसार, सहित बडी संख्या में महिलाएं पुरूष उपस्थित थे।