मेरे शरीर के असंख्य कण बना कर दुखियों के ह्रदय में रख दो मैं सभी का दुःख झेल सकूँ ओर संसार मे कोई भी दुःखी न हो – प. श्री शास्त्री

श्री राम-कृष्ण विवाह धूमधाम से मनाया गया
मन्दसौर। वैदिक विवाह में फेरे के समय कन्या का भाई किसी भी उम्र का हो ,उसके हाथों कुछ आहुतियां से हवन करके वर वधू फेरे पूरे करते हैं।यंहा भाई का शास्त्रोक्त भाव यह होता है कि,है हमारे माता-पिता ने संकल्प करके बहन अपना गौत्र त्याग कर आपको दूसरे गौत्र में वर को कन्या दान कर दिया है। जिससे आप पराए घर की हो चुकी हो। मैं आपका भाई भी अग्नि में आहुति देकर वचन देता हूं ।कभी माता-पिता रुठ जाए ,आपका माता-पिता घर आना न हो,चिंता मत करना। भाई के घर दरवाजा हमेशा खुला रहेगा, बिना बुलाए भी आ जाना,कभी भी रीते हाथ नहीं जाओगी। यह उदगार भागवतभूषणाचार्य पं. श्रीकृष्ण वल्लभ शास्त्री, मालवा स्वामी ने व्यक्त किये। संत कवँरराम कालोनी, नागेश्वर दरबार में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में राजा रंतिदेव का मार्मिक प्रसंग बताते हुए,शास्त्री जी ने कहा कि ,रंतिदेव दैववश प्राप्त वस्तु ही सेवन करते थे।एक बार अड़तालीस दिन तक पूरा परिवार को अन्न जल नहीं मिला, भूख-प्यास से पीड़ित परिवार को उनपचासवें दिन अन्न आते ही भोजन करते समय ब्राह्मण आदि अतिथि पधार गए उन्हें भोजन देकर ,खुद भूखे रहे ओर भगवान से प्रार्थना करी की मेरे शरीर के असंख्य कण बना कर दुखियों के ह्रदय मे रख दो मैं सभी का दुःख झेल सकूँ ओर संसार मे कोई भी दुःखी न हो । पं. शास्त्री जी के मुखारविंद से अमृतवाणी सुनने के लिए भक्तजन उमड़ रहे हैं।